2026 में पेरेंटिंग की सोच एक बार फिर संतुलन और संरचना की ओर लौट रही है। पिछले कुछ वर्षों तक “जेंटल पेरेंटिंग” पर ज़ोर रहा, जिसमें सहानुभूति, समझ और पारंपरिक अनुशासन से दूरी बनाने की बात की जाती थी।
लेकिन 2025 के अंत तक पूरे हुए लंबे समय के अध्ययनों से एक अहम बात सामने आई है। ऐसे बच्चे, जिन्हें बहुत प्यार तो मिला लेकिन स्पष्ट सीमाएँ नहीं मिलीं, उनमें आत्मनियंत्रण की कमी, ध्यान लगाने में परेशानी और असफलता को स्वीकार न कर पाने जैसी समस्याएँ अधिक देखी गईं। विशेषज्ञ इसे “एग्ज़ीक्यूटिव डिस्फंक्शन” से जोड़कर देखते हैं।
अब बाल मनोवैज्ञानिक और विशेषज्ञ फिर से “ऑथोरिटेटिव पेरेंटिंग” मॉडल को अपनाने की सलाह दे रहे हैं। इस मॉडल में बच्चों के साथ गहरा भावनात्मक जुड़ाव रखा जाता है, लेकिन साथ ही कुछ नियम ऐसे होते हैं जिन पर कोई समझौता नहीं किया जाता। यहाँ सख्ती का मतलब कठोर या डर पैदा करने वाला व्यवहार नहीं है। इसका अर्थ है बच्चों के लिए एक सुरक्षित और स्पष्ट ढाँचा तैयार करना।
आधुनिक न्यूरोसाइंस भी यह पुष्टि करता है कि बच्चे का दिमाग, खासकर उसका प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स, एक तय और भरोसेमंद संरचना में बेहतर तरीके से विकसित होता है। जब माता-पिता स्पष्ट नियम और सीमाएँ तय करते हैं, तो वे बच्चों के व्यवहार को केवल नियंत्रित नहीं कर रहे होते। वे उस समय तक बाहरी सहारा दे रहे होते हैं, जब तक बच्चे के भीतर आत्मअनुशासन पूरी तरह विकसित नहीं हो जाता।
यह लेख उन खास क्षेत्रों पर रोशनी डालता है, जहाँ आज बाल मनोवैज्ञानिक, डॉक्टर और शिक्षक सख्त रुख अपनाने की सलाह देते हैं। इनमें डिजिटल आदतें, भावनात्मक व्यवहार और सामाजिक शिष्टाचार जैसे विषय शामिल हैं। सही तरह की सख्ती बच्चों को मजबूत, जिम्मेदार और मानसिक रूप से स्वस्थ वयस्क बनने में मदद करती है।
2026 में बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर बहस का स्वरूप बदल चुका है। अब सवाल यह नहीं है कि बच्चा कितनी देर स्क्रीन देखता है, बल्कि यह है कि वह किस तरह की डिजिटल सामग्री देख रहा है और किस समय उसका उपयोग हो रहा है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और वर्चुअल तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के कारण विशेषज्ञ डिजिटल एक्सेस को लेकर सख्त नियमों की सलाह दे रहे हैं।
“वेट अनटिल 8th” जैसे अभियानों को आगे बढ़ाते हुए, 2026 में अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स American Academy of Pediatrics (AAP) ने स्पष्ट सिफारिश की है कि 16 वर्ष की उम्र से पहले बच्चों को एल्गोरिदम आधारित सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रखा जाए।
2025 के आंकड़ों में पाया गया कि ऐसे प्लेटफॉर्म, जो बच्चों को बार-बार इनाम जैसे अनुभव देते हैं, उनके दिमाग के डोपामिन सिस्टम को प्रभावित करते हैं। इससे कम उम्र के बच्चों में ध्यान से जुड़ी समस्याएँ लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ गईं।
नियम:
16 साल से पहले कोई व्यक्तिगत सोशल मीडिया अकाउंट नहीं।
14 साल से पहले खुले इंटरनेट वाला स्मार्टफोन नहीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सोने से पहले तकनीक से दूरी बेहद जरूरी है। इसलिए सलाह दी जाती है कि सभी निजी डिवाइस, जैसे मोबाइल, टैबलेट या वीआर हेडसेट, सोने से कम से कम 90 मिनट पहले एक तय जगह पर चार्जिंग के लिए रख दिए जाएँ।
क्यों जरूरी है:
नीली रोशनी और तेज़ उत्तेजना देने वाला डिजिटल कंटेंट शरीर में मेलाटोनिन हार्मोन के बनने में बाधा डालता है। 2026 के एक अध्ययन में पाया गया कि जिन बच्चों के कमरे में कोई डिजिटल डिवाइस नहीं थी, उनकी गहरी नींद की गुणवत्ता 22 प्रतिशत बेहतर थी।
यह आम धारणा है कि बच्चे सप्ताहांत में ज्यादा सोकर नींद की भरपाई कर सकते हैं, लेकिन विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि सोने का समय रोज़ लगभग एक जैसा होना चाहिए और इसमें 30 मिनट से ज्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए, चाहे वह वीकेंड ही क्यों न हो।
आंकड़ों से समझें:
अनियमित नींद से “सोशल जेटलैग” की समस्या होती है, जिससे बच्चों को सोमवार को गणित और जटिल सोच से जुड़े कामों में कठिनाई आती है।
उदाहरण:
10 साल के बच्चे के लिए रात 9 बजे सोना कोई सुझाव नहीं, बल्कि एक जैविक आवश्यकता है। इस समय नींद लेने से दिमाग की सफाई प्रणाली ठीक से काम करती है और मानसिक विकास बेहतर होता है।
यह स्पष्ट है कि आधुनिक पेरेंटिंग में सख्ती का मतलब अनुशासन और संरचना देना है, न कि डर पैदा करना। सही नियम बच्चों को स्वस्थ, संतुलित और आत्मनियंत्रित बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
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हालाँकि “फूड फ्रीडम” एक लोकप्रिय विचार बन चुका है, लेकिन बाल विशेषज्ञ कुछ खास पदार्थों को लेकर सख्ती बरतने की सलाह देते हैं। ऐसे पदार्थ बच्चों के दिमागी विकास को प्रभावित कर सकते हैं, इसलिए इन पर नियंत्रण जरूरी माना जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) World Health Organization (WHO) और बाल पोषण विशेषज्ञ 2026 में यह सलाह दे रहे हैं कि बच्चों के भोजन में अतिरिक्त चीनी, खासकर पेय पदार्थों में, बहुत सीमित होनी चाहिए।
नियम:
सप्ताह के दिनों में मीठे पेय जैसे सोडा और एनर्जी ड्रिंक जैसे जूस पूरी तरह बंद रहें।
क्यों जरूरी है:
ज्यादा चीनी से शरीर में ग्लूकोज तेजी से बढ़ता है, जिससे “इंसुलिन थकान” होती है। इसका सीधा संबंध बच्चों के चिड़चिड़े व्यवहार और कक्षा में लंबे समय तक शांत न बैठ पाने से देखा गया है।
आजकल खास कॉफी और एनर्जी ड्रिंक बच्चों तक आसानी से पहुँच रहे हैं। विशेषज्ञ इसे लेकर चेतावनी दे रहे हैं। उनका कहना है कि 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए कैफीन पूरी तरह बंद होनी चाहिए और किशोरों के लिए भी इसकी मात्रा बहुत सीमित होनी चाहिए।
क्यों नुकसानदायक है:
कैफीन किशोर दिमाग में होने वाली “सिनैप्स की छंटाई” प्रक्रिया को प्रभावित करता है। यह प्रक्रिया वयस्क उम्र में बेहतर सोचने और समझने की क्षमता के लिए बेहद जरूरी होती है।
आधुनिक सख्त पेरेंटिंग का एक अहम नियम है बच्चों के लिए हर छोटी परेशानी में तुरंत मदद न करना। इसे “लॉजिकल कंसिक्वेंसेज़ रूल” भी कहा जाता है।
विशेषज्ञों की सलाह है कि अगर बच्चा अपना लंच, होमवर्क या खेल का सामान भूल जाए, तो माता-पिता उसे स्कूल जाकर न दें।
सीख:
इससे बच्चे को “स्वस्थ तनाव” का अनुभव होता है। 10 साल की उम्र में भूखा रह जाना, 25 साल की उम्र में बड़ी जिम्मेदारी भूल जाने से कहीं बेहतर है।
विशेषज्ञों की राय:
डॉ. जोनाथन हाइट Dr. Jonathan Haidt और अन्य सामाजिक मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जरूरत से ज्यादा सुरक्षा देना आज की चिंता और डर की समस्या का बड़ा कारण है। प्राकृतिक परिणामों को स्वीकार करना बच्चों में हिम्मत और धैर्य विकसित करता है।
आज के दौर में “खुद को खुलकर व्यक्त करने” के नाम पर कुछ माता-पिता सम्मान की सीमाएँ ढीली कर देते हैं। विशेषज्ञ इसके उलट, भाषा और व्यवहार में सख्ती की सलाह देते हैं।
विशेषज्ञ माता-पिता और भाई-बहनों के प्रति अपमानजनक शब्दों, आँखें दिखाने या “चुप रहो” जैसे वाक्यों पर पूरी तरह जीरो टॉलरेंस की सलाह देते हैं।
व्यवहार का तरीका:
अगर बच्चा असम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल करे, तो बातचीत तुरंत रोक दी जाए। जब तक बच्चा शालीन भाषा में बात न करे, तब तक कोई चर्चा न हो।
क्यों जरूरी है:
सम्मान एक बुनियादी सामाजिक कौशल है। अगर बच्चा यह सीख ले कि वह गुस्से या अपमानजनक भाषा से माता-पिता पर दबाव बना सकता है, तो आगे चलकर उसे नौकरी और रिश्तों में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
इन नियमों का उद्देश्य बच्चों को डराना नहीं, बल्कि उन्हें जिम्मेदार, आत्मनियंत्रित और सामाजिक रूप से सक्षम बनाना है। सही सख्ती बच्चों के भविष्य को मजबूत आधार देती है।
बाल विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को घर के कामों में योगदान देना चाहिए, बिना किसी आर्थिक लालच के।
2026 में वित्तीय साक्षरता विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को पैसे का सही उपयोग सिखाने के लिए पॉकेट मनी देना ठीक है, लेकिन इसे रोज़मर्रा के घरेलू कामों से जोड़ना सही नहीं है।
जैसे कि अपना कमरा साफ़ करना या खाने की प्लेट उठाना, ये सभी बुनियादी ज़िम्मेदारियाँ हैं।
नियम: घर में रहने वाला हर सदस्य काम करता है, पैसे के लिए नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी के लिए।
तर्क: अगर बच्चों को हर छोटे काम के बदले पैसे दिए जाएँ, तो उनमें “स्वार्थ की सोच” विकसित हो सकती है।
बिना पैसे के काम करने का सख़्त नियम बच्चों को “समूह की ज़िम्मेदारी” का महत्व सिखाता है।
इससे बच्चे समझते हैं कि परिवार एक टीम है, जहाँ हर किसी का योगदान ज़रूरी है।
यह समझने के लिए कि विशेषज्ञ “सख़्त लेकिन समझदार” नियमों की सलाह क्यों देते हैं, अलग-अलग पैरेंटिंग स्टाइल को देखना ज़रूरी है।
छूट देने वाला पालन-पोषण (Permissive Parenting):
इसमें प्यार तो बहुत होता है, लेकिन नियम कम होते हैं।
इसका नतीजा यह होता है कि बच्चे ज़्यादा चिंता करते हैं और आत्म-नियंत्रण कम होता है।
तानाशाही पालन-पोषण (Authoritarian Parenting):
इसमें नियम बहुत सख़्त होते हैं, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव कम होता है।
इससे बच्चों में आत्म-सम्मान की कमी और विद्रोह की भावना पैदा हो सकती है।
उपेक्षापूर्ण पालन-पोषण (Uninvolved Parenting):
इसमें न तो प्यार होता है और न ही सीमाएँ।
ऐसे बच्चों का सामाजिक और शैक्षणिक विकास कमजोर हो सकता है।
संतुलित और अनुशासित पालन-पोषण (Authoritative Parenting):
इसमें प्यार भी होता है और स्पष्ट नियम भी।
शोध के अनुसार ऐसे बच्चे ज़्यादा आत्मनिर्भर, मानसिक रूप से स्वस्थ और मज़बूत बनते हैं।
आज के दौर में, जहाँ एक क्लिक में ऑनलाइन खरीदारी हो जाती है, बच्चों को खर्च करने के सही तरीके सिखाना बहुत ज़रूरी हो गया है।
विशेषज्ञों की सलाह है कि किसी भी गैर-ज़रूरी चीज़ की खरीदारी से पहले कम से कम 72 घंटे का इंतज़ार किया जाए।
यह नियम खास तौर पर महँगी चीज़ों पर लागू होना चाहिए।
नतीजा:
इससे बच्चे जल्दबाज़ी में फैसला नहीं लेते।
वे भावनाओं के बजाय सोच-समझकर निर्णय करना सीखते हैं।
अगर बच्चा कोई महँगी चीज़ चाहता है, जैसे गेमिंग कंसोल या ब्रांडेड जूते, तो विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बच्चे को कीमत का एक हिस्सा खुद देना चाहिए।
यह राशि बचत या मेहनत के ज़रिए कमाई जा सकती है, जैसे 20 प्रतिशत।
इससे बच्चों को पैसों की क़ीमत समझ में आती है और वे ज़िम्मेदार उपभोक्ता बनते हैं।
कुछ संस्कृतियों में यह माना जाता है कि बच्चों को घर पर ही शराब या अन्य नशे से “परिचित” करा देने से भविष्य में लत नहीं लगती।
लेकिन 2025 और 2026 के नए न्यूरोलॉजिकल शोध इस सोच से सहमत नहीं हैं, खासकर बढ़ते हुए दिमाग के मामले में।
दिमाग की स्कैन रिपोर्ट बताती हैं कि जिन लोगों ने 21 साल की उम्र से पहले शराब या टीएचसी जैसे नशीले पदार्थों का सेवन शुरू किया, उनके मस्तिष्क की संरचना में साफ़ अंतर देखा गया।
इनका दिमाग उन लोगों की तुलना में ज़्यादा प्रभावित पाया गया, जिन्होंने कानूनी उम्र के बाद ही इन चीज़ों को अपनाया।
नियम:
कानूनी उम्र तक शराब, निकोटीन (वेपिंग) और टीएचसी का बिल्कुल भी उपयोग नहीं किया जाएगा।
कारण:
किशोर अवस्था में दिमाग बहुत तेज़ी से विकसित हो रहा होता है।
इस समय दिमाग नई आदतों को बहुत जल्दी अपनाता है।
अगर इस दौर में नशीले पदार्थों का सेवन शुरू हो जाए, तो दिमाग की आदतें आसानी से लत की ओर मुड़ सकती हैं।
यही वजह है कि विशेषज्ञ पूरी तरह परहेज़ की सलाह देते हैं।
2026 में बाल विशेषज्ञों की सबसे अहम सीख यह है कि सख़्त होना और बेरहम होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
सख़्ती का मतलब:
“तुम इस पार्टी में नहीं जा सकते क्योंकि वहाँ कोई बड़ा व्यक्ति मौजूद नहीं होगा, और यह हमारे घर का सुरक्षा नियम है।
मुझे पता है कि तुम्हें बुरा लग रहा है, इसलिए चाहो तो मैं तुम्हारे दोस्तों को घर बुला सकता हूँ।”
कठोरता का मतलब:
“तुम नहीं जाओगे क्योंकि मैंने मना कर दिया है।
अगर ज़्यादा रोए, तो और डाँट पड़ेगी।”
संतुलित और समझदार पालन-पोषण पहले तरीके को अपनाता है।
इसमें नियम भी होते हैं और भावनात्मक सहयोग भी।
जब बच्चे को साफ़ पता होता है कि सीमा कहाँ है, तो वह खुद को ज़्यादा सुरक्षित महसूस करता है।
अस्पष्ट नियम बच्चों में डर और चिंता पैदा करते हैं।
2026 में विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए सख़्त पालन-पोषण के नियम बच्चों की आज़ादी छीनने के लिए नहीं हैं।
इनका मकसद बच्चों का भविष्य मज़बूत बनाना है।
नींद, डिजिटल आदतों, सम्मान और ज़िम्मेदारी को लेकर सख़्ती करके माता-पिता बच्चों को अंदरूनी ताक़त देते हैं।
यह ताक़त उन्हें एक उलझी और ध्यान भटकाने वाली दुनिया में आगे बढ़ने में मदद करती है।
स्पष्ट सीमाएँ बच्चों को सुरक्षा का एहसास कराती हैं।
जिस बच्चे को पता होता है कि उसके माता-पिता ख़तरनाक या गलत चीज़ों के लिए “ना” कहेंगे, वह खुद को सुरक्षित और cared महसूस करता है।
आख़िरकार, माता-पिता का सबसे प्यार भरा काम आज “ना” कहना होता है।
ताकि बच्चा कल सही मौकों के लिए आत्मविश्वास के साथ “हाँ” कह सके।
पालन-पोषण में निरंतरता ही सच्चा प्रेम है।