सेमीकंडक्टर आज आधुनिक तकनीक की बुनियाद बन चुके हैं। स्मार्टफोन, कार, डेटा सेंटर, मेडिकल उपकरण, सैटेलाइट, औद्योगिक मशीनें, अक्षय ऊर्जा से जुड़ी तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी कई महत्वपूर्ण तकनीकें उन्नत चिप्स पर निर्भर करती हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग के बढ़ते इस्तेमाल से कंप्यूटिंग क्षमता की मांग तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में भरोसेमंद सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का महत्व भी पहले से कहीं अधिक हो गया है।
इसी वैश्विक बदलाव के बीच SEMICON India 2026 ने भारत के बढ़ते सेमीकंडक्टर क्षेत्र की एक विस्तृत तस्वीर पेश की। इस आयोजन में दिखाया गया कि भारत की सेमीकंडक्टर से जुड़ी महत्वाकांक्षाएं अब केवल चिप डिजाइन तक सीमित नहीं हैं। देश में सेमीकंडक्टर निर्माण, एडवांस्ड पैकेजिंग, जरूरी सामग्री, निर्माण उपकरण, रिसर्च, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और पूरी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम तकनीक पर भी तेजी से काम हो रहा है।
SEMICON India 2026 का पांचवां संस्करण 17 से 19 सितंबर 2026 तक नई दिल्ली स्थित यशोभूमि में आयोजित किया गया। इस वर्ष कार्यक्रम की थीम “Silicon to Systems: Building the Ecosystem” यानी “सिलिकॉन से सिस्टम तक, इकोसिस्टम का निर्माण” थी।
इस आयोजन में 600 से अधिक प्रदर्शक, करीब 300 अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागी, 52 देशों के प्रतिनिधि और 150 से अधिक वक्ता शामिल हुए। तीन दिनों के दौरान कार्यक्रम के लिए 51,656 रजिस्ट्रेशन हुए और कुल फुटफॉल करीब 40,000 रहा।
इस आयोजन का बड़ा स्तर यह दिखाता है कि भारत की तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग रणनीति में सेमीकंडक्टर उद्योग की भूमिका लगातार बढ़ रही है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि SEMICON India 2026 ने यह स्पष्ट किया कि भारत की सेमीकंडक्टर यात्रा अब केवल चिप डिजाइन करने तक सीमित नहीं है।
देश अब एक ऐसे व्यापक इकोसिस्टम को विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिसमें चिप डिजाइन से लेकर निर्माण, पैकेजिंग, परीक्षण और तैयार इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम तक पूरी प्रक्रिया को जोड़ा जा सके।
SEMICON India 2026 को केवल सेमीकंडक्टर निर्माण पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय पूरी वैल्यू चेन को ध्यान में रखकर आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि चिप बनाने की प्रक्रिया कई अलग-अलग क्षेत्रों और तकनीकों से मिलकर पूरी होती है।
इस प्रदर्शनी में सेमीकंडक्टर उद्योग से जुड़े कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों की तकनीकों और संस्थाओं को एक साथ प्रस्तुत किया गया। इनमें सेमीकंडक्टर डिजाइन, वेफर निर्माण, असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग, एडवांस्ड पैकेजिंग, सेमीकंडक्टर सामग्री, निर्माण उपकरण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, रिसर्च एंड डेवलपमेंट, स्टार्टअप, कुशल कर्मचारियों का विकास, सप्लाई चेन और टिकाऊ तकनीक जैसे क्षेत्र शामिल थे।
कार्यक्रम में 6 देशों के पवेलियन और 12 राज्यों के पवेलियन भी शामिल रहे। इसके अलावा स्टार्टअप पवेलियन, वर्कफोर्स डेवलपमेंट जोन, इनोवेशन शोकेस और स्टूडेंट हैकाथॉन भी आयोजित किए गए। तीन दिनों के दौरान डिजाइन, फैब्रिकेशन, पैकेजिंग, उपकरण, सामग्री, AI, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, रिसर्च एंड डेवलपमेंट, लॉजिस्टिक्स और कुशल कर्मचारियों के विकास जैसे क्षेत्रों में 56 MoUs, घोषणाएं और रणनीतिक पहल सामने आईं।
यह व्यापक भागीदारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक मजबूत सेमीकंडक्टर उद्योग केवल एक फैब बनाने से तैयार नहीं हो सकता। इसके लिए चिप डिजाइनर, फैब और फाउंड्री, पैकेजिंग कंपनियां, निर्माण उपकरण बनाने वाली कंपनियां, रसायन और अन्य जरूरी सामग्री के निर्माता, टेस्टिंग सुविधाएं, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, रिसर्च संस्थान और प्रशिक्षित इंजीनियरों का एक साथ काम करना जरूरी है।
इस तरह SEMICON India 2026 ने यह दिखाया कि भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में केवल एक या दो चरणों पर निर्भर रहने के बजाय पूरी वैल्यू चेन को विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
भारत में सेमीकंडक्टर क्षेत्र को बढ़ावा देने के पीछे बड़ा आर्थिक अवसर भी मौजूद है। दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक वाहन, स्मार्ट डिवाइस और डिजिटल तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल से चिप्स की मांग तेजी से बढ़ रही है।
हालिया McKinsey विश्लेषण McKinsey analysis के अनुसार, वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार का आकार 2026 में 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गया है। मौजूदा अनुमान के आधार पर यह बाजार 2030 तक करीब 2.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। इस वृद्धि के पीछे AI इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा सेंटर, अत्याधुनिक प्रोसेसर और मेमोरी चिप्स की बढ़ती मांग प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
वहीं, Deloitte की 2026 इंडस्ट्री आउटलुक Deloitte industry outlook रिपोर्ट में वैश्विक सेमीकंडक्टर बिक्री करीब 975 अरब डॉलर रहने का अनुमान लगाया गया है। अलग-अलग संस्थाओं के अनुमानों में अंतर मुख्य रूप से बाजार की परिभाषा, समय और अनुमान लगाने के तरीकों के कारण हो सकता है। हालांकि, दोनों आकलन इस बात की ओर संकेत करते हैं कि AI और दूसरी उभरती तकनीकों के कारण सेमीकंडक्टर उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है।
भारत में भी सेमीकंडक्टर की मांग बढ़ने की उम्मीद है। सरकारी अनुमानों के अनुसार, भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 2024-25 में लगभग 45 से 50 अरब डॉलर का था। इसके 2030 तक करीब 100 से 110 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
भारत में सेमीकंडक्टर की बढ़ती मांग कई क्षेत्रों से आएगी। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं।
स्मार्टफोन और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स।
ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रिक वाहन।
दूरसंचार और नेटवर्किंग।
डेटा सेंटर।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस।
औद्योगिक ऑटोमेशन।
रक्षा और एयरोस्पेस।
अक्षय ऊर्जा से जुड़ी तकनीक।
स्मार्ट बिजली मीटर।
इंटरनेट ऑफ थिंग्स यानी IoT डिवाइस।
भारत में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और डिजिटल सेवाओं का बाजार लगातार बढ़ रहा है। इससे घरेलू स्तर पर चिप्स की मांग बढ़ने के साथ भारतीय कंपनियों के लिए दूसरे देशों के बाजारों में अपने सेमीकंडक्टर उत्पाद और तकनीक पहुंचाने के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
SEMICON India 2026 में भारत की सेमीकंडक्टर क्षमता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी सामने आया कि देश का फोकस केवल अलग-अलग चिप डिजाइन करने तक सीमित नहीं है। अब पूरा कंप्यूटिंग सिस्टम विकसित करने की दिशा में भी काम हो रहा है।
Centre for Development of Advanced Computing (C-DAC) ने हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग और AI से जुड़ी अपनी स्वदेशी तकनीकों को प्रदर्शित किया। इनमें AUM HPC-AI Processor और RUDRA-AUM compute node प्रमुख रूप से शामिल रहे।
इस तरह की तकनीक यह समझने में मदद करती है कि सेमीकंडक्टर क्षमता का मतलब केवल सिलिकॉन चिप बनाना नहीं है। किसी प्रोसेसर की वास्तविक उपयोगिता तब सामने आती है, जब उसे सर्वर, कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म, AI सिस्टम और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक अनुप्रयोगों के साथ जोड़ा जाता है।
भारत लंबे समय से सेमीकंडक्टर डिजाइन और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपनी क्षमता के लिए जाना जाता है। अब बड़ी चुनौती इन क्षमताओं को स्वदेशी प्रोसेसर आर्किटेक्चर, फैब्रिकेशन, पैकेजिंग और पूरे सिस्टम के विकास से जोड़ने की है।
हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग का महत्व भी तेजी से बढ़ रहा है। खासकर AI के बढ़ते इस्तेमाल के कारण ऐसे कंप्यूटर सिस्टम की जरूरत बढ़ रही है, जो बहुत बड़ी मात्रा में डेटा को तेजी से प्रोसेस कर सकें और कम ऊर्जा में बेहतर प्रदर्शन दे सकें।
McKinsey के हालिया विश्लेषण के अनुसार, सर्वर और डेटा सेंटर से जुड़े सेमीकंडक्टर बाजार का राजस्व 2025 में लगभग 330 अरब डॉलर से बढ़कर 2030 तक करीब 1.2 ट्रिलियन डॉलर हो सकता है। इस वृद्धि में AI इंफ्रास्ट्रक्चर की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
इस तेजी से बढ़ती मांग के कारण भारतीय कंपनियों के लिए सेमीकंडक्टर के कई क्षेत्रों में अवसर बन रहे हैं। इनमें CPU, AI एक्सेलेरेटर, नेटवर्किंग चिप्स, मेमोरी तकनीक, पावर मैनेजमेंट और विशेष जरूरतों के लिए बनाए जाने वाले प्रोसेसर शामिल हैं।
भारत यदि चिप डिजाइन, निर्माण और सिस्टम इंटीग्रेशन को एक साथ आगे बढ़ाता है, तो इससे देश में एक अधिक मजबूत और व्यापक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार करने में मदद मिल सकती है। यह इकोसिस्टम घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स और तकनीकी सप्लाई चेन में भारत की भागीदारी को भी बढ़ा सकता है।
भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति में RISC-V जैसी ओपन प्रोसेसर आर्किटेक्चर तकनीकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। RISC-V एक ओपन इंस्ट्रक्शन सेट आर्किटेक्चर है। इसका इस्तेमाल कंपनियां और रिसर्च संस्थान अपनी जरूरत के अनुसार प्रोसेसर डिजाइन विकसित करने के लिए कर सकते हैं।
इस तकनीक का एक फायदा यह है कि कुछ खास अनुप्रयोगों के लिए कंपनियों को पूरी तरह से प्रोप्राइटरी प्रोसेसर आर्किटेक्चर पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। इससे अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से प्रोसेसर और चिप विकसित करने में अधिक लचीलापन मिल सकता है।
C-DAC द्वारा विकसित स्वदेशी 64-बिट RISC-V प्रोसेसर भी इसी दिशा में भारत के प्रयासों का एक उदाहरण है। यह काम देश में अपनी प्रोसेसर डिजाइन क्षमता विकसित करने और घरेलू सेमीकंडक्टर तकनीक को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
RISC-V का महत्व केवल प्रोसेसर बनाने तक सीमित नहीं है। घरेलू स्तर पर विकसित प्रोसेसर IP का इस्तेमाल अलग-अलग प्रकार की चिप और सिस्टम तैयार करने के लिए किया जा सकता है। इसके संभावित उपयोग वाले क्षेत्रों में शामिल हैं।
एम्बेडेड सिस्टम।
औद्योगिक उपकरण।
ऑटोमोबाइल तकनीक।
दूरसंचार और नेटवर्किंग।
एज AI।
स्मार्ट डिवाइस।
सुरक्षा और निगरानी सिस्टम।
हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग।
भारत में InCore Semiconductors भी RISC-V आधारित तकनीक पर काम करने वाली कंपनियों में शामिल है। कंपनी RISC-V प्रोसेसर IP और System-on-Chip यानी SoC डिजाइन ऑटोमेशन से जुड़ी तकनीक विकसित करती है।
इस तरह की कंपनियां केवल किसी एक चिप को विकसित करने के बजाय ऐसे सेमीकंडक्टर IP तैयार करने पर भी काम कर रही हैं, जिन्हें अलग-अलग चिप और सिस्टम में दोबारा इस्तेमाल किया जा सके। इससे घरेलू चिप डिजाइन इकोसिस्टम को लंबे समय में मजबूत बनाने में मदद मिल सकती है।
एक मजबूत घरेलू सेमीकंडक्टर IP इकोसिस्टम से भारतीय कंपनियों को चिप डिजाइन से मिलने वाली वैल्यू का बड़ा हिस्सा देश में बनाए रखने और स्थानीय आर्किटेक्चर पर आधारित नए उत्पाद विकसित करने में मदद मिल सकती है।
भारत में स्वदेशी नेटवर्किंग तकनीक का विकास भी चिप डिजाइन से आगे बढ़कर पूरे सिस्टम तैयार करने की दिशा को दिखाता है।
Aheesa Digital Innovations ने Vihaan-I नाम की स्वदेशी ब्रॉडबैंड नेटवर्किंग चिप को प्रदर्शित किया। यह चिप RISC-V आर्किटेक्चर पर आधारित है और इसमें C-DAC की प्रोसेसर तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
कंपनी के अनुसार, Vihaan-I ने अगस्त 2026 में फर्स्ट-पास सिलिकॉन सफलता हासिल की। इससे पहले इसी वर्ष चिप का टेप-आउट पूरा किया गया था। कंपनी नेटवर्किंग क्षेत्र के भागीदारों के साथ मिलकर इस तकनीक को व्यावसायिक रूप से उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रही है।
ऐसी स्वदेशी नेटवर्किंग तकनीक का महत्व भारत में तेजी से बढ़ती इंटरनेट और डिजिटल कनेक्टिविटी की जरूरतों के कारण और बढ़ जाता है। देश में हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड, फाइबर नेटवर्क और अन्य डिजिटल सेवाओं के विस्तार के साथ नेटवर्किंग उपकरणों की मांग भी बढ़ रही है।
यदि ऐसे उपकरणों में घरेलू स्तर पर विकसित चिप और प्रोसेसर तकनीक का इस्तेमाल बढ़ता है, तो इससे भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स और दूरसंचार सप्लाई चेन को अधिक विविध और मजबूत बनाने में मदद मिल सकती है।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि सेमीकंडक्टर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का अर्थ यह नहीं है कि हर चिप, उपकरण और सामग्री को शुरुआत से ही देश में तैयार किया जाए। आत्मनिर्भरता की प्रक्रिया में घरेलू IP, सिस्टम आर्किटेक्चर, सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म और प्रोडक्ट इंटीग्रेशन जैसी क्षमताओं को विकसित करना भी शामिल है। इसके बाद धीरे-धीरे मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन के दूसरे हिस्सों को भी स्थानीय स्तर पर मजबूत किया जा सकता है।
इस तरह भारत एक चरणबद्ध तरीके से ऐसा सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार कर सकता है, जिसमें डिजाइन से लेकर तैयार तकनीकी उत्पाद तक कई महत्वपूर्ण क्षमताएं देश में मौजूद हों।
सेमीकंडक्टर उद्योग का मतलब केवल AI डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाले अत्याधुनिक प्रोसेसर से नहीं है। रोजमर्रा के कई इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों में भी छोटे और विशेष काम के लिए डिजाइन किए गए चिप्स और कंट्रोलर की जरूरत होती है।
इसी क्षेत्र में Vervesemi Microelectronics एक उदाहरण है। कंपनी मोटर कंट्रोल, एनर्जी मीटर, डेटा कलेक्शन और अन्य औद्योगिक जरूरतों के लिए सेमीकंडक्टर समाधान विकसित कर रही है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार, Vervesemi ने BLDC पंखों, इलेक्ट्रिक वाहनों, ड्रोन, औद्योगिक ऑटोमेशन, एनर्जी मीटर और एवियोनिक्स जैसे क्षेत्रों के लिए चिप डिजाइन विकसित किए हैं। कंपनी के पोर्टफोलियो में 55 nm, 110 nm और 180 nm जैसे अलग-अलग प्रोसेस नोड पर आधारित डिजाइन भी शामिल हैं।
यह उदाहरण बताता है कि सेमीकंडक्टर उद्योग में केवल सबसे छोटे और अत्याधुनिक प्रोसेस नोड ही महत्वपूर्ण नहीं होते। अलग-अलग उत्पादों के लिए अलग-अलग प्रकार की चिप तकनीक की आवश्यकता होती है।
आज 3 nm और 2 nm जैसे अत्याधुनिक प्रोसेस नोड वाले प्रोसेसर काफी चर्चा में रहते हैं। इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से हाई-एंड कंप्यूटिंग, स्मार्टफोन और AI जैसे क्षेत्रों में किया जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पुराने या मच्योर प्रोसेस नोड की मांग खत्म हो गई है।
कई महत्वपूर्ण उद्योग अभी भी इन तकनीकों पर आधारित चिप्स पर निर्भर करते हैं। इनमें शामिल हैं।
ऑटोमोबाइल इलेक्ट्रॉनिक्स।
औद्योगिक कंट्रोलर।
पावर मैनेजमेंट सिस्टम।
सेंसर।
स्मार्ट और डिजिटल एनर्जी मीटर।
घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उपकरण।
मेडिकल उपकरण।
दूरसंचार और नेटवर्किंग उपकरण।
उदाहरण के लिए, किसी स्मार्ट मीटर या औद्योगिक मोटर कंट्रोलर को हमेशा अत्याधुनिक 2 nm या 3 nm चिप की आवश्यकता नहीं होती। उसके लिए विश्वसनीय, कम लागत वाली और लंबे समय तक उपलब्ध रहने वाली विशेष चिप अधिक उपयोगी हो सकती है।
इसलिए भारत के लिए सेमीकंडक्टर क्षमता विकसित करते समय केवल अत्याधुनिक प्रोसेस नोड पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। देश को मच्योर नोड, विशेष उपयोग वाली चिप, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, ऑटोमोबाइल चिप्स और अत्याधुनिक प्रोसेसर, सभी क्षेत्रों में अपनी क्षमताएं विकसित करने की जरूरत होगी।
यही विविधता भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को अधिक मजबूत बना सकती है और अलग-अलग उद्योगों की जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकती है।
SEMICON India 2026 में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI से जुड़ी तकनीक भी सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का एक प्रमुख हिस्सा रही। AI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने चिप्स की मांग और उनके डिजाइन के तरीके को भी बदलना शुरू कर दिया है।
AI से जुड़ी सेमीकंडक्टर मांग को मुख्य रूप से दो स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला है डेटा सेंटर AI, जिसमें बड़ी मात्रा में डेटा को प्रोसेस करने के लिए शक्तिशाली प्रोसेसर, AI एक्सेलेरेटर, हाई-बैंडविड्थ मेमोरी और तेज नेटवर्किंग तकनीक की जरूरत होती है।
दूसरा है एज AI। इसमें डेटा को किसी दूर के क्लाउड सर्वर पर भेजने के बजाय उसी डिवाइस या उसके आसपास प्रोसेस किया जाता है। ऐसे सिस्टम कैमरा, वाहन, औद्योगिक मशीन, रोबोट, ड्रोन और दूसरे स्मार्ट डिवाइस में लगाए जा सकते हैं।
एज कंप्यूटिंग भारतीय चिप स्टार्टअप्स के लिए भी नए अवसर पैदा कर सकती है। इसका कारण यह है कि एज डिवाइस के लिए केवल अधिक कंप्यूटिंग पावर ही पर्याप्त नहीं होती। ऐसे चिप्स में बेहतर ऊर्जा दक्षता, सुरक्षा, कम प्रतिक्रिया समय और मजबूत कनेक्टिविटी जैसी सुविधाओं का संतुलन भी जरूरी होता है।
केरल स्थित Netrasemi इसका एक उदाहरण है। कंपनी ने A2000 नाम का 12 nm एज-AI System-on-Chip विकसित किया है। इसे निगरानी सिस्टम, रोबोटिक्स, स्मार्ट वीडियो सिस्टम और औद्योगिक ऑटोमेशन जैसे क्षेत्रों में इस्तेमाल के लिए तैयार किया गया है। कंपनी ने इसके सिलिकॉन को तैयार करने और शुरुआती स्तर पर जांच की प्रक्रिया पूरी कर ली है तथा ग्राहक मूल्यांकन की दिशा में भी आगे बढ़ रही है।
इस तरह के चिप्स यह दिखाते हैं कि AI के कारण सेमीकंडक्टर के अवसर केवल बड़े डेटा सेंटर तक सीमित नहीं रह गए हैं। अब स्मार्ट कैमरा, ड्रोन, रोबोट, वाहन और औद्योगिक मशीनों में भी स्थानीय स्तर पर AI प्रोसेसिंग की जरूरत बढ़ रही है।
उदाहरण के लिए, AI आधारित कैमरे को हर छोटी जानकारी क्लाउड सर्वर पर भेजने की आवश्यकता नहीं होती। कैमरा खुद कुछ डेटा का विश्लेषण कर सकता है और जरूरी जानकारी ही आगे भेज सकता है। इससे प्रतिक्रिया का समय कम हो सकता है और डेटा की गोपनीयता बेहतर तरीके से बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
इसी तरह किसी औद्योगिक मशीन में एज-AI चिप मशीन के प्रदर्शन की निगरानी कर सकती है और किसी संभावित समस्या के शुरुआती संकेतों को पहचानने में मदद कर सकती है। इसलिए स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक ऑटोमेशन में एज-AI चिप्स की भूमिका आने वाले समय में और बढ़ सकती है।
SEMICON India 2026 से यह भी स्पष्ट हुआ कि सेमीकंडक्टर का निर्माण केवल वेफर बनाने तक सीमित नहीं है। वेफर तैयार होने के बाद भी चिप को बाजार में इस्तेमाल योग्य बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।
एक सामान्य प्रक्रिया में कई चरण शामिल होते हैं।
वेफर से अलग-अलग चिप डाई को काटना।
चिप को पैकेज करना।
जरूरत के अनुसार उसे दूसरे कंपोनेंट से जोड़ना।
चिप की टेस्टिंग करना।
उसके निर्धारित उपयोग के लिए उसकी गुणवत्ता और विश्वसनीयता की जांच करना।
अंत में उसे इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में इंटीग्रेट करना।
इन प्रक्रियाओं में एडवांस्ड पैकेजिंग का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। आधुनिक कंप्यूटिंग में एक ही पैकेज के अंदर कई डाई, चिपलेट, हाई-बैंडविड्थ मेमोरी और अलग-अलग प्रकार के प्रोसेसर को एक साथ जोड़ा जा सकता है।
AI के बढ़ते इस्तेमाल ने एडवांस्ड पैकेजिंग की जरूरत को और बढ़ाया है। अब केवल ट्रांजिस्टर का आकार छोटा करना ही बेहतर प्रदर्शन पाने का एकमात्र तरीका नहीं है। प्रोसेसर, मेमोरी और उनके बीच डेटा के आदान-प्रदान की व्यवस्था भी सिस्टम की क्षमता को प्रभावित करती है।
इसी वजह से चिपलेट, हाई-बैंडविड्थ मेमोरी और अलग-अलग चिप को एक साथ जोड़ने वाली तकनीकों पर दुनिया भर में काम बढ़ रहा है।
भारत का OSAT और ATMP क्षेत्र पर बढ़ता ध्यान इसी व्यापक सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन सुविधाओं के माध्यम से चिप्स की असेंबली, पैकेजिंग और टेस्टिंग जैसी प्रक्रियाओं को देश में विकसित किया जा सकता है।
इससे भारत को सेमीकंडक्टर उद्योग के उस हिस्से में भी अपनी क्षमता बढ़ाने का अवसर मिलता है, जो चिप डिजाइन और वेफर निर्माण के बीच तथा अंतिम इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद तक पहुंचने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
2026 में भारत के सेमीकंडक्टर क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह देखने को मिला कि कई योजनाएं और निवेश घोषणाएं अब वास्तविक व्यावसायिक उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
Semicon India Programme के पहले चरण के तहत छह राज्यों में 12 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी। इन परियोजनाओं का उद्देश्य देश में चिप निर्माण, पैकेजिंग और सेमीकंडक्टर से जुड़ी दूसरी क्षमताओं को विकसित करना है।
SEMICON India 2026 की शुरुआत के दौरान दो और सुविधाओं में व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया गया।
CDIL Semiconductor की ATMP सुविधा, मोहाली, पंजाब।
Suchi Semicon की OSAT सुविधा, पलसाना, गुजरात।
इन दो सुविधाओं के शुरू होने के बाद Semicon 1.0 के तहत मंजूर परियोजनाओं में व्यावसायिक रूप से उत्पादन शुरू करने वाली सुविधाओं की संख्या पांच हो गई। इनमें गुजरात में Micron, Kaynes Semicon और CG Semi की सुविधाएं भी शामिल हैं।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी सेमीकंडक्टर परियोजना की घोषणा और उसमें निवेश का वादा होना, वास्तविक उत्पादन शुरू होने से अलग बात है।
एक सेमीकंडक्टर सुविधा के सफल संचालन के लिए कई स्तरों पर क्षमता साबित करनी होती है। इसमें शामिल हैं।
उत्पादन प्रक्रिया की विश्वसनीयता।
बेहतर और स्थिर उत्पादन यील्ड।
गुणवत्ता नियंत्रण।
मशीनों और उपकरणों का लगातार संचालन।
भरोसेमंद सप्लाई चेन।
ग्राहकों की तकनीकी और गुणवत्ता संबंधी मंजूरी।
चिप की टेस्टिंग और विश्वसनीयता जांच।
प्रशिक्षित और कुशल कर्मचारियों की उपलब्धता।
पर्यावरण और सुरक्षा से जुड़े मानकों का पालन।
इसलिए व्यावसायिक उत्पादन की शुरुआत भारत के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के लिए एक अधिक ठोस चरण को दर्शाती है। इसका अर्थ है कि परियोजनाएं अब केवल योजना और निवेश के स्तर से आगे बढ़कर वास्तविक निर्माण और बाजार की जरूरतों से जुड़ रही हैं।
आने वाले समय में इन सुविधाओं की उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता, ग्राहक आधार और सप्लाई चेन से जुड़ाव यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे कि भारत अपने सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को कितनी तेजी से और कितनी व्यापकता के साथ विकसित कर पाता है।
भारत में सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग का क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है। इस क्षेत्र में बड़ी वैश्विक कंपनियों के साथ-साथ भारतीय कंपनियां भी बड़े स्तर पर निवेश कर रही हैं।
Micron ने गुजरात के साणंद स्थित अपने प्लांट में DRAM और NAND की व्यावसायिक उत्पादन गतिविधियां शुरू कर दी हैं। SEMICON India 2026 के दौरान कंपनी की ओर से इस दिशा में जानकारी साझा की गई।
वहीं, Tata Electronics गुजरात के धोलेरा में 300 mm सेमीकंडक्टर फैब विकसित कर रही है। कंपनी असम में एक OSAT सुविधा भी विकसित कर रही है। SEMICON India 2026 के दौरान Tata Electronics ने वेफर मैन्युफैक्चरिंग, असेंबली और टेस्टिंग, एडवांस्ड पैकेजिंग, फोटोरेसिस्ट, रसायन, सेमीकंडक्टर सामग्री और कुशल कर्मचारियों के विकास से जुड़े कई साझेदारियों और प्रयासों की जानकारी दी।
इन परियोजनाओं से यह भी स्पष्ट होता है कि सेमीकंडक्टर फैब अकेले काम नहीं कर सकता है। एक फैब को लगातार कई तरह के कच्चे माल, तकनीक, उपकरण और सेवाओं की जरूरत होती है।
एक मजबूत सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम के लिए भारत में इन क्षेत्रों का विकास भी जरूरी है।
इलेक्ट्रॉनिक केमिकल्स।
विशेष गैसें।
फोटोरेसिस्ट।
सिलिकॉन वेफर्स।
मैन्युफैक्चरिंग उपकरण।
पैकेजिंग सामग्री।
टेस्टिंग सिस्टम।
पानी को शुद्ध और दोबारा उपयोग करने वाली प्रणालियां।
क्लीन-रूम इंफ्रास्ट्रक्चर।
लॉजिस्टिक्स और सप्लाई-चेन सेवाएं।
इन सहायक उद्योगों का विकास यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन में कितनी गहराई तक अपनी जगह बना पाता है। केवल चिप बनाने वाले प्लांट स्थापित करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ एक मजबूत और भरोसेमंद सप्लाई चेन तैयार करना भी जरूरी होगा।
भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति में Semicon 1.0 से Semicon 2.0 की ओर बढ़ना एक महत्वपूर्ण बदलाव माना जा रहा है। SEMICON India 2026 के आसपास यह नीति बदलाव खास चर्चा में रहा।
केंद्र सरकार ने जुलाई 2026 में Semicon 2.0 को मंजूरी दी। इसके लिए कुल ₹1,27,500 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत में सेमीकंडक्टर से जुड़े पूरे इकोसिस्टम को मजबूत करना है। इसके लिए छह प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया गया है।
Semicon 2.0 का एक प्रमुख उद्देश्य भारत की चिप डिजाइन क्षमता को और मजबूत करना है। इसके तहत घरेलू कंपनियों और संस्थानों को अपनी सेमीकंडक्टर तकनीक और Semiconductor Intellectual Property यानी Semiconductor IP विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
इससे भारत केवल दूसरे देशों के लिए चिप डिजाइन करने तक सीमित न रहकर अपनी तकनीक और उत्पाद विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
सेमीकंडक्टर बनाने के लिए केवल फैब की जरूरत नहीं होती। इसके लिए अत्याधुनिक मशीनों, विशेष रसायनों, गैसों, वेफर्स और अन्य सामग्री की भी आवश्यकता होती है।
भारत में इन क्षेत्रों की घरेलू क्षमता बढ़ाने से वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भरता कम करने और संभावित सप्लाई बाधाओं से निपटने में मदद मिल सकती है।
Semicon 2.0 का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य भारत में वेफर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का विस्तार करना है। नए फैब स्थापित होने से देश की घरेलू चिप निर्माण क्षमता बढ़ेगी और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग का आधार मजबूत होगा।
यह भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर भी दे सकता है।
आज के आधुनिक सेमीकंडक्टर सिस्टम में पैकेजिंग की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। खासकर AI चिप्स, Chiplets और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम में एडवांस्ड पैकेजिंग महत्वपूर्ण है।
इसलिए भारत के लिए केवल चिप बनाना ही नहीं, बल्कि उन्हें आधुनिक तरीके से पैकेज और सिस्टम में एकीकृत करने की क्षमता विकसित करना भी जरूरी है।
सेमीकंडक्टर क्षेत्र में लंबे समय तक प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए लगातार रिसर्च और नई तकनीकों का विकास जरूरी है।
इसके तहत नए सेमीकंडक्टर डिवाइस, नई सामग्री, प्रोसेसर आर्किटेक्चर, मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं और चिप को पूरे सिस्टम में एकीकृत करने जैसी तकनीकों पर अनुसंधान महत्वपूर्ण होगा।
एक मजबूत सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए बड़ी संख्या में कुशल इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों की जरूरत होती है।
भारत को सेमीकंडक्टर डिजाइन इंजीनियरों के साथ-साथ तकनीशियनों, रिसर्चर्स, उपकरण विशेषज्ञों, प्रोसेस इंजीनियरों और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े अन्य पेशेवरों को भी तैयार करना होगा।
इसके लिए विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों, कंपनियों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के बीच बेहतर सहयोग महत्वपूर्ण होगा।
Semicon 2.0 की मंजूरी से यह संकेत मिलता है कि भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति अब केवल अलग-अलग परियोजनाओं को बढ़ावा देने तक सीमित नहीं है। इसका ध्यान डिजाइन से लेकर मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग, रिसर्च, मशीनरी, सामग्री और कुशल प्रतिभा तक पूरे सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को विकसित करने पर है।
इस तरह भारत का लक्ष्य केवल चिप निर्माण की क्षमता विकसित करना नहीं, बल्कि एक ऐसा व्यापक औद्योगिक आधार तैयार करना है, जिसमें सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन के अलग-अलग हिस्से एक-दूसरे से जुड़े हों।
सेमीकंडक्टर उद्योग को मजबूत बनाने के लिए कुशल और प्रशिक्षित लोगों की जरूरत सबसे महत्वपूर्ण आधारों में से एक है। भारत के पास पहले से ही बड़ी संख्या में इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ हैं। हालांकि, सेमीकंडक्टर उद्योग में काम करने के लिए सामान्य इंजीनियरिंग शिक्षा के साथ कुछ विशेष तकनीकी कौशल भी जरूरी होते हैं।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं।
VLSI डिजाइन।
चिप वेरिफिकेशन।
सेमीकंडक्टर प्रोसेस इंजीनियरिंग।
लिथोग्राफी।
चिप पैकेजिंग।
डिवाइस फिजिक्स।
केमिकल इंजीनियरिंग।
मटेरियल साइंस।
सेमीकंडक्टर उपकरणों का रखरखाव।
Yield Engineering।
Reliability Testing।
AI Hardware Design।
भारत सरकार ने सेमीकंडक्टर डिजाइन और प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाने के लिए Chips to Startup यानी C2S Programme और Design Linked Incentive जैसी पहलें शुरू की हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य छात्रों, इंजीनियरों, शैक्षणिक संस्थानों और स्टार्टअप्स को आधुनिक चिप डिजाइन टूल्स और प्रशिक्षण तक बेहतर पहुंच उपलब्ध कराना है।
सरकारी जानकारी के अनुसार, ChipIN Centre और इससे जुड़े कार्यक्रमों के माध्यम से 500 से अधिक संस्थानों और संगठनों के एक लाख से ज्यादा इंजीनियरों को जोड़ा गया है। इनमें शैक्षणिक संस्थान और स्टार्टअप भी शामिल हैं।
इन कार्यक्रमों के तहत 300 से अधिक चिप डिजाइन तैयार किए गए हैं, जिन्हें भारत और दूसरे देशों में फैब्रिकेशन के लिए भेजा गया है। प्रतिभागियों ने चिप डिजाइन से जुड़े टूल्स का इस्तेमाल करते हुए चार करोड़ से अधिक घंटे का उपयोग भी पूरा किया है।
इस तरह के कार्यक्रम विश्वविद्यालयों में मिलने वाली इलेक्ट्रॉनिक्स शिक्षा और उद्योग की वास्तविक जरूरतों के बीच मौजूद अंतर को कम करने में मदद कर सकते हैं।
हालांकि, अगली बड़ी चुनौती केवल डिजाइन टूल्स तक पहुंच उपलब्ध कराना नहीं है। इंजीनियरों और छात्रों को वास्तविक उत्पादन का अनुभव, इंडस्ट्री इंटर्नशिप, फैब्रिकेशन प्रक्रियाओं की जानकारी और पूरे सिस्टम के स्तर पर उत्पाद विकसित करने का अनुभव भी देना जरूरी होगा।
यदि प्रशिक्षण को वास्तविक उद्योग अनुभव से जोड़ा जाता है, तो इससे भारत के लिए भविष्य में सेमीकंडक्टर डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग के लिए अधिक मजबूत और तैयार कार्यबल विकसित किया जा सकता है।
वैश्विक सेमीकंडक्टर की कमी ने यह दिखाया है कि दुनिया के किसी एक हिस्से में होने वाली सप्लाई में रुकावट का असर हजारों किलोमीटर दूर स्थित उद्योगों पर भी पड़ सकता है।
सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग एक बहुत जटिल और आपस में जुड़ी हुई वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर करती है। एक ही चिप या इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद की प्रक्रिया कई देशों से जुड़ी हो सकती है।
उदाहरण के लिए, किसी चिप की आर्किटेक्चर और डिजाइन एक देश में तैयार हो सकती है, उसकी मैन्युफैक्चरिंग दूसरे देश में हो सकती है, मशीनें कई अलग-अलग देशों से आ सकती हैं, विशेष रसायन अलग-अलग कंपनियों से मिल सकते हैं और पैकेजिंग तथा अंतिम असेंबली किसी अन्य स्थान पर हो सकती है।
इस वजह से सप्लाई चेन के किसी एक हिस्से में आने वाली समस्या का असर पूरी उत्पादन प्रक्रिया पर पड़ सकता है।
हाल के वर्षों में वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और व्यापार से जुड़ी अनिश्चितताओं के कारण कंपनियों और देशों ने अपनी सप्लाई चेन को अलग-अलग स्रोतों में बांटने और अधिक सुरक्षित बनाने पर भी जोर दिया है।
भारत सरकार की हालिया पृष्ठभूमि जानकारी के अनुसार, 2014 से 2024 के बीच वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार में औसतन लगभग 6.5 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई। आने वाले वर्षों में मांग में और तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है।
इसी जानकारी के अनुसार, भारत ने वित्त वर्ष 2017 से वित्त वर्ष 2025 के बीच लगभग 150 अरब डॉलर मूल्य के सेमीकंडक्टर उत्पादों का आयात किया। यह आंकड़ा भारत में मौजूद विशाल घरेलू मांग और स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग के अवसरों को दर्शाता है।
इसलिए भारत का लक्ष्य केवल आयात को कम करना नहीं है। एक मजबूत घरेलू सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार होने से भारतीय कंपनियों को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन का हिस्सा बनने का अवसर भी मिल सकता है।
इसका अर्थ है कि भारत में ऐसी कंपनियां विकसित हो सकती हैं जो केवल घरेलू बाजार के लिए चिप या इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट तैयार न करें, बल्कि दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिए भी चिप डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग, सामग्री, उपकरण और अन्य सेवाओं की आपूर्ति कर सकें।
इस तरह एक मजबूत सप्लाई चेन भारत की घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ देश को वैश्विक सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने में मदद कर सकती है।
SEMICON India 2026 का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि भारत की सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षा केवल चिप बनाने तक सीमित नहीं है। देश अब एक ऐसे व्यापक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिसमें चिप की शुरुआत से लेकर उसके अंतिम उपयोग तक की पूरी प्रक्रिया को शामिल किया जा सके।
भारत में विकसित हो रहा यह इकोसिस्टम कई अलग-अलग चरणों को एक साथ जोड़ता है।
सामग्री → उपकरण → चिप डिजाइन → फैब्रिकेशन → पैकेजिंग → टेस्टिंग → इलेक्ट्रॉनिक्स → AI → कंप्यूटिंग सिस्टम → वैश्विक बाजार।
यही कारण है कि SEMICON India 2026 की थीम “Silicon to Systems: Building the Ecosystem” काफी महत्वपूर्ण रही। इसका अर्थ है कि भारत का लक्ष्य केवल सिलिकॉन वेफर पर चिप तैयार करना नहीं, बल्कि उस चिप को एक उपयोगी और व्यावसायिक सिस्टम में बदलने के लिए जरूरी पूरी श्रृंखला विकसित करना है।
किसी प्रोसेसर की उपयोगिता केवल उसके निर्माण से पूरी नहीं होती। उसे सुरक्षित और प्रभावी तरीके से इस्तेमाल करने के लिए सही पैकेजिंग की जरूरत होती है। इसी तरह कोई फैब आवश्यक मशीनों और कच्ची सामग्री के बिना काम नहीं कर सकता।
किसी चिप को बाजार में उपयोग होने वाला उत्पाद बनाने के लिए उसकी टेस्टिंग और सिस्टम इंटीग्रेशन भी जरूरी है। वहीं, किसी सेमीकंडक्टर कंपनी के लिए कुशल इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों और ग्राहकों की उपलब्धता उसके विस्तार के लिए महत्वपूर्ण होती है।
इसलिए सेमीकंडक्टर उद्योग का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि ये सभी अलग-अलग हिस्से कितनी अच्छी तरह एक-दूसरे से जुड़ पाते हैं।
SEMICON India 2026 ने भारत के तेजी से विकसित हो रहे सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम की एक तस्वीर सामने रखी। यह इकोसिस्टम अब पहले की तुलना में अधिक व्यापक होने के साथ-साथ व्यावसायिक गतिविधियों पर भी ज्यादा ध्यान दे रहा है।
भारत में सेमीकंडक्टर को लेकर चर्चा अब केवल सरकारी नीतियों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रह गई है। राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर कार्यक्रम के पहले चरण के तहत पांच सेमीकंडक्टर यूनिट्स में व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो चुका है। इसके अलावा कई नई फैब सुविधाएं, पैकेजिंग यूनिट्स और सेमीकंडक्टर से जुड़ा सपोर्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित किया जा रहा है।
दूसरी ओर, भारतीय स्टार्टअप्स RISC-V प्रोसेसर, AI SoCs, मोटर-कंट्रोल चिप्स, ब्रॉडबैंड प्रोसेसर और अन्य एप्लिकेशन-स्पेसिफिक तकनीकों पर काम कर रहे हैं। सरकारी कार्यक्रमों के माध्यम से चिप डिजाइन टूल्स तक पहुंच बढ़ाई जा रही है। वहीं Semicon 2.0 ने चिप डिजाइन, मशीनरी, सामग्री, फैब, एडवांस्ड पैकेजिंग, रिसर्च और प्रतिभा विकास के लिए एक व्यापक नीति ढांचा तैयार किया है।
वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार भी तेजी से बदल रहा है। AI के विस्तार से प्रोसेसर, मेमोरी, नेटवर्किंग और एडवांस्ड पैकेजिंग की मांग में तेजी आई है। McKinsey के हालिया विश्लेषण के अनुसार, वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार 2030 तक संभावित रूप से 2.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। हालांकि, वास्तविक वृद्धि AI में निवेश, उत्पादन क्षमता के विस्तार, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और नई तकनीकों के विकास जैसे कई कारकों पर निर्भर करेगी।
भारत के लिए अवसर केवल घरेलू मांग को पूरा करने तक सीमित नहीं है।
बड़ा लक्ष्य वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में एक मजबूत और एकीकृत भागीदार बनना है। इसके लिए भारत को अपनी सेमीकंडक्टर IP, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, विशेष सप्लायर नेटवर्क और सिस्टम-स्तरीय तकनीकों को लगातार विकसित करना होगा।
भारत के सेमीकंडक्टर क्षेत्र की प्रगति को अब केवल निवेश की घोषणाओं या मंजूर की गई परियोजनाओं की संख्या से नहीं मापा जा सकता। आने वाले समय में उत्पादन की गुणवत्ता और Yield, व्यावसायिक उत्पादों की संख्या, वैश्विक ग्राहकों की उपलब्धता, घरेलू सप्लायर नेटवर्क, रिसर्च के परिणाम, कुशल रोजगार और बड़े स्तर पर प्रतिस्पर्धी तकनीक विकसित करने की क्षमता भी महत्वपूर्ण होगी।
SEMICON India 2026 ने संकेत दिया है कि भारत का सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम धीरे-धीरे आकार ले रहा है। इसकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत Silicon, Systems, Talent, Research, Manufacturing और Global Partnerships को कितनी प्रभावी तरीके से एक साथ जोड़ पाता है।
यदि ये सभी क्षेत्र एक मजबूत और टिकाऊ व्यवस्था के रूप में विकसित होते हैं, तो भारत के पास वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग में अपनी भूमिका को और व्यापक बनाने का अवसर होगा।