भारतीय सिनेमा के सबसे अलग, प्रभावशाली और बहुमुखी कलाकारों में शामिल नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. उनके जाने के साथ थिएटर, हिंदी सिनेमा और मराठी सिनेमा में फैले उनके शानदार सफर का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।
कई पीढ़ियों के दर्शकों के लिए नाना पाटेकर केवल एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि अपने अभिनय से किरदारों में जान डाल देने वाले ऐसे कलाकार थे, जिन्हें भुलाना आसान नहीं है।
उनकी दमदार आवाज, तीखे हाव-भाव, संवाद बोलने का खास अंदाज और पर्दे पर गहरी मौजूदगी ने उनके किरदारों को बेहद प्रभावशाली बना दिया। चाहे किरदार कितना भी जटिल क्यों न हो, नाना पाटेकर उसे अपनी खास अभिनय शैली से ऐसा बना देते थे कि वह लंबे समय तक दर्शकों के जेहन में बना रहता था।
थिंक-विथ-निश ThinkWithNiche में हम नाना पाटेकर को उन यादगार किरदारों और कहानियों के जरिए याद कर रहे हैं, जिन्होंने उनके असाधारण फिल्मी सफर को पहचान दी।
करीब पांच दशकों के अपने करियर में उन्होंने गैंगस्टर, पुलिस अधिकारी, सैनिक, राजनेता, क्रांतिकारी और संघर्ष से जूझ रहे लोगों से लेकर हास्य किरदारों तक कई अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने गंभीर ड्रामा, अपराध आधारित फिल्मों, सामाजिक विषयों और कॉमेडी जैसे अलग-अलग तरह के सिनेमा में अपनी अभिनय क्षमता साबित की।
परिंदा में खतरनाक अन्ना से लेकर क्रांतिवीर में जोशीले प्रताप नारायण तिलक, अब तक छप्पन में साधु आगाशे, नटसम्राट में गणपतराव बेलवलकर और वेलकम में उदय शेट्टी तक, नाना पाटेकर ने हर किरदार को अपनी अलग पहचान दी. उनके अभिनय में मानवीय भावनाओं, कमजोरियों और विरोधाभासों को समझने की गहरी क्षमता दिखाई देती थी।
भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को कई प्रतिष्ठित सम्मानों से भी सम्मानित किया गया. नाना पाटेकर को परिंदा और अग्निसाक्षी के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता और क्रांतिवीर के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें बाद में पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया।
इस दिग्गज अभिनेता को श्रद्धांजलि देते हुए, इस लेख में नाना पाटेकर की 10 ऐसी यादगार फिल्मों और दमदार परफॉर्मेंस 10 Memorable Films and Powerful Performances by Nana Patekar पर नजर डाली गई है, जिन्होंने उनकी अभिनय प्रतिभा, भावनात्मक गहराई और भारतीय सिनेमा पर उनके लंबे प्रभाव को सामने रखा।
नाना पाटेकर का निधन उनके शानदार सफर के एक अध्याय का अंत जरूर है, लेकिन उनके निभाए किरदार और उनकी यादगार अदाकारी आने वाली पीढ़ियों तक दर्शकों की यादों और भारतीय सिनेमा के इतिहास में जीवित रहेगी।
विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म परिंदा नाना पाटेकर के करियर की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक मानी जाती है। इस क्राइम ड्रामा में उन्होंने अन्ना नाम के एक खतरनाक और गुस्सैल गैंगस्टर की भूमिका निभाई थी। फिल्म में अन्ना का किरदार अपनी मौजूदगी से कहानी पर गहरा असर डालता है।
नाना पाटेकर Nana Patekar ने अन्ना को किसी सामान्य फिल्मी विलेन की तरह पेश नहीं किया। उन्होंने इस किरदार को बेहद अस्थिर और अप्रत्याशित बनाया। अन्ना का गुस्सा, हिंसक व्यवहार और भावनात्मक असंतुलन उसे एक ऐसा किरदार बनाते हैं, जिसे दर्शक आसानी से भूल नहीं सकते। पाटेकर ने कई जगह शांत और नियंत्रित अंदाज में डर पैदा किया, तो वहीं अचानक गुस्से के दृश्यों में उनके अभिनय की तीव्रता साफ नजर आई।
इस भूमिका के लिए नाना पाटेकर को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके अलावा उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड फॉर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर से भी सम्मानित किया गया। इस किरदार ने यह साबित किया कि एक सहायक भूमिका भी शानदार अभिनय के दम पर पूरी फिल्म की सबसे प्रभावशाली भूमिकाओं में शामिल हो सकती है।
परिंदा को हिंदी सिनेमा की महत्वपूर्ण क्राइम फिल्मों में गिना जाता है। फिल्म में नाना पाटेकर का अन्ना आज भी उनके सबसे यादगार किरदारों में शामिल है। इस भूमिका ने उनकी अभिनय शैली की एक खास पहचान को मजबूत किया। वह दर्शकों को एक साथ असहज भी कर सकते थे, अपनी ओर आकर्षित भी कर सकते थे और किरदार से भावनात्मक रूप से जोड़ भी सकते थे।
अगर परिंदा ने नाना पाटेकर को एक दमदार अभिनेता के रूप में स्थापित किया, तो क्रांतिवीर ने उन्हें एक प्रमुख अभिनेता के तौर पर और मजबूत पहचान दिलाई।
मेहुल कुमार की फिल्म क्रांतिवीर में नाना पाटेकर ने प्रताप नारायण तिलक की भूमिका निभाई थी। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी थी, जो जीवन के अनुभवों से निराश और परेशान हो चुका है। हालांकि, आगे चलकर वह भ्रष्टाचार, अन्याय और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाने का रास्ता चुनता है।
इस किरदार में नाना पाटेकर को गुस्से के साथ-साथ भावनात्मक कमजोरी भी दिखानी थी। प्रताप शुरुआत से ही एक आदर्श नायक के रूप में सामने नहीं आता। उसके जीवन का संघर्ष और उसके अनुभव धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व में बदलाव लाते हैं। यही बात इस किरदार को अधिक मानवीय और प्रभावशाली बनाती है।
इस भूमिका के लिए नाना पाटेकर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। उन्हें इस प्रदर्शन के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड फॉर बेस्ट एक्टर भी दिया गया।
क्रांतिवीर में नाना पाटेकर की संवाद बोलने की शैली भी खूब चर्चा में रही। वह शब्दों को खास वजन देकर बोलते थे और सही जगह पर ठहराव का इस्तेमाल करते थे। उनकी आवाज में गुस्सा, दर्द और दृढ़ता एक साथ महसूस होती थी।
यही संवाद अदायगी आगे चलकर नाना पाटेकर की अभिनय पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। कई दशक बीत जाने के बाद भी क्रांतिवीर में उनका अभिनय उनके करियर की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है।
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नाना पाटेकर के बाद के करियर ने यह साबित किया कि उनकी अभिनय क्षमता केवल क्राइम फिल्मों या गुस्सैल किरदारों तक सीमित नहीं थी। मराठी फिल्म नटसम्राट में उनका अभिनय उनकी भावनात्मक गहराई और विविधता का शानदार उदाहरण है।
फिल्म की कहानी गणपतराव बेलवलकर के इर्द-गिर्द घूमती है। वह एक प्रसिद्ध रंगमंच कलाकार हैं, जिनकी जिंदगी रिटायरमेंट के बाद अचानक बदल जाती है। पूरी जिंदगी दर्शकों के सामने अभिनय करने वाले गणपतराव के लिए मंच से दूर होने के बाद अपनी पहचान बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।
नाना पाटेकर ने इस किरदार में कई अलग-अलग भावनाओं को बेहद प्रभावी ढंग से दिखाया। उनके अभिनय में गर्व, अकेलापन, प्यार, पछतावा, निराशा और कमजोरी जैसे भाव दिखाई देते हैं। कई दृश्यों में ये भाव एक साथ नजर आते हैं।
नटसम्राट इसलिए भी महत्वपूर्ण फिल्म रही क्योंकि इसमें नाना पाटेकर ने बिना ज्यादा गुस्से या आक्रामकता के बेहद भावुक और असरदार अभिनय किया।
गणपतराव के किरदार के जरिए उन्होंने उम्र बढ़ने के साथ आने वाली भावनात्मक चुनौतियों और एक कलाकार की पेशेवर पहचान खोने के दर्द को पर्दे पर दिखाया। यह भूमिका उनके करियर के बाद के दौर की सबसे मजबूत और भावनात्मक प्रस्तुतियों में शामिल हो गई।
अब तक छप्पन में नाना पाटेकर ने मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट साधु आगाशे का किरदार निभाया था। यह भूमिका उनके पहले के गैंगस्टर और विद्रोही किरदारों से काफी अलग थी।
इस फिल्म में नाना पाटेकर ने हर समय तेज आवाज या बड़े हाव-भाव का सहारा नहीं लिया। इसके बजाय उन्होंने अपने किरदार को शांत और नियंत्रित अंदाज में पेश किया। साधु आगाशे का प्रभाव इस बात से भी पैदा होता है कि वह कई मुश्किल परिस्थितियों में भी बेहद संयमित दिखाई देता है।
फिल्म मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्टों की दुनिया से प्रेरित थी और इसमें उनकी कार्यशैली से जुड़े नैतिक सवालों को भी सामने रखा गया था। नाना पाटेकर ने साधु आगाशे के किरदार में अधिकार, कठोरता और कई तरह की नैतिक जटिलताओं को प्रभावी ढंग से दिखाया।
अब तक छप्पन ने यह दिखाया कि नाना पाटेकर बिना ज्यादा हाव-भाव के भी किसी किरदार को प्रभावशाली बना सकते हैं। उनकी आंखों के भाव, संवादों के बीच ठहराव और छोटे-छोटे रिएक्शन कई बार उनके शब्दों से ज्यादा असर पैदा करते हैं।
साधु आगाशे का किरदार उनके यादगार क्राइम रोल्स में शामिल हुआ। इस भूमिका ने यह भी साबित किया कि नाना पाटेकर जटिल और नैतिक रूप से उलझे हुए किरदारों को भी बेहद प्रभावी तरीके से पर्दे पर पेश कर सकते थे।
प्रहार: द फाइनल अटैक नाना पाटेकर के फिल्मी करियर की खास फिल्मों में शामिल है। इसकी खास बात यह है कि इसमें उन्होंने केवल अभिनय ही नहीं किया, बल्कि निर्देशन और लेखन में भी अपनी भूमिका निभाई।
फिल्म में नाना पाटेकर ने मेजर चौहान का किरदार निभाया था। यह कहानी सेना की जिंदगी, अनुशासन, जिम्मेदारी और हिंसा जैसे गंभीर विषयों के साथ-साथ सैन्य जीवन के मानसिक प्रभावों को भी सामने लाती है।
मेजर चौहान का किरदार नाना पाटेकर की अभिनय शैली के लिए काफी उपयुक्त था। उन्होंने इस भूमिका में एक अधिकारी का रुतबा और अनुशासन तो दिखाया, लेकिन किरदार को केवल सख्त सैन्य अधिकारी तक सीमित नहीं रखा। उनके अभिनय में इंसानी भावनाओं और अंदरूनी संघर्षों की झलक भी दिखाई दी।
प्रहार यह भी दिखाती है कि नाना पाटेकर की दिलचस्पी केवल अभिनय तक सीमित नहीं थी। कैमरे के पीछे काम करते हुए उन्होंने गंभीर सामाजिक और मानवीय विषयों पर कहानी कहने की अपनी इच्छा को भी सामने रखा।
नाना पाटेकर के पूरे करियर को पीछे मुड़कर देखने पर प्रहार इसलिए खास हो जाती है क्योंकि यह सिर्फ उनकी एक महत्वपूर्ण अभिनय भूमिका नहीं थी। यह फिल्म उनके अंदर मौजूद एक निर्देशक और कहानीकार की रचनात्मक सोच को भी सामने लाती है।
अग्नि साक्षी में नाना पाटेकर ने एक बेहद चुनौतीपूर्ण किरदार निभाया था। इस फिल्म ने एक बार फिर साबित किया कि वह बिना किसी पारंपरिक विलेन वाली छवि के भी दर्शकों के मन में डर और बेचैनी पैदा कर सकते थे।
यह मनोवैज्ञानिक थ्रिलर एक ऐसे जटिल और परेशान करने वाले व्यक्तित्व पर केंद्रित थी, जिसके व्यवहार से कहानी में लगातार तनाव बना रहता है। नाना पाटेकर ने इस किरदार की मानसिक जटिलताओं को प्रभावी ढंग से पर्दे पर उतारा।
उनकी अदाकारी की वजह से किरदार का डर केवल उसके व्यवहार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसकी मानसिक स्थिति भी दर्शकों के लिए चिंता और तनाव का कारण बनती है।
इस भूमिका के लिए नाना पाटेकर को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। यह उनका तीसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार था।
नाना पाटेकर को अलग-अलग तरह की भूमिकाओं के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलना उनके अभिनय की निरंतरता और विविधता को दर्शाता है।
परिंदा में उन्होंने एक खतरनाक गैंगस्टर की भूमिका को यादगार बनाया। क्रांतिवीर में उन्होंने एक ऐसे प्रमुख किरदार को निभाया, जिसमें गुस्से के साथ सामाजिक बदलाव की भावना थी। वहीं अग्नि साक्षी में उन्होंने मनोवैज्ञानिक रूप से जटिल भूमिका के जरिए अपनी अलग अभिनय क्षमता दिखाई।
इन तीनों फिल्मों को साथ रखकर देखें तो साफ होता है कि नाना पाटेकर किसी एक तरह की भूमिका तक सीमित अभिनेता नहीं थे। वह अलग-अलग परिस्थितियों, भावनाओं और किरदारों के अनुसार अपनी अभिनय शैली को बदलने में सक्षम थे।
नई पीढ़ी के कई दर्शकों के लिए नाना पाटेकर की पहचान वेलकम के उदय शेट्टी के किरदार से भी जुड़ी है।
अनीस बज्मी के निर्देशन में बनी इस कॉमेडी फिल्म ने नाना पाटेकर को एक बिल्कुल अलग अंदाज में देखने का मौका दिया। इससे पहले वह गंभीर, आक्रामक और भावनात्मक किरदारों के लिए ज्यादा पहचाने जाते थे। लेकिन उदय शेट्टी के रूप में उन्होंने अपनी कॉमेडी टाइमिंग का भी शानदार प्रदर्शन किया।
उदय शेट्टी एक गैंगस्टर है, लेकिन उसका व्यक्तित्व सिर्फ डर पैदा करने वाला नहीं है। वह भावुक, नाटकीय, अधिकार जताने वाला और कई बार अनजाने में बेहद मजेदार नजर आता है। नाना पाटेकर ने इस किरदार के हास्य को समझते हुए उसे केवल एक मजाकिया चरित्र बनने से बचाया।
उनके अभिनय में किरदार की गंभीरता और कॉमेडी दोनों साथ दिखाई देती हैं। यही संतुलन उदय शेट्टी को फिल्म के सबसे यादगार किरदारों में शामिल करता है।
फिल्म में अनिल कपूर द्वारा निभाए गए मजनू भाई के साथ नाना पाटेकर के कई दृश्य बेहद लोकप्रिय हुए। दोनों किरदारों के बीच का अंतर फिल्म के हास्य को और मजबूत करता है।
नाना पाटेकर गंभीर चेहरे और बेहद गंभीर अंदाज में ऐसी बातें बोलते हैं, जो परिस्थितियों की वजह से हास्यास्पद बन जाती हैं। बिना ज्यादा भाव बदले मजेदार संवाद बोलने की उनकी शैली उदय शेट्टी के किरदार की खास पहचान बन गई।
वेलकम ने यह भी साबित किया कि नाना पाटेकर सिर्फ गंभीर और भावनात्मक भूमिकाओं तक सीमित नहीं थे। वह मुख्यधारा की कॉमेडी फिल्म में भी अपनी दमदार मौजूदगी से दर्शकों का ध्यान खींच सकते थे। उदय शेट्टी उनके करियर के उन किरदारों में शामिल हो गया, जिसने उनकी अभिनय क्षमता का एक बिल्कुल अलग पहलू दर्शकों के सामने रखा।
प्रकाश झा की फिल्म अपहरण में नाना पाटेकर ने तबरेज आलम का किरदार निभाया था। यह एक प्रभावशाली और जटिल व्यक्ति का चरित्र था, जिसका संबंध राजनीति और अपराध की दुनिया से था।
फिल्म ने बिहार में राजनीति, संगठित अपराध और अपहरण के कारोबार के बीच के संबंध को सामने रखा। तबरेज आलम का किरदार ऐसी ताकत का प्रतिनिधित्व करता है, जो डर, संपर्कों और राजनीतिक रिश्तों के जरिए अपना प्रभाव बनाए रखती है।
नाना पाटेकर ने इस किरदार को केवल एक अच्छे या बुरे व्यक्ति के रूप में पेश नहीं किया। तबरेज आलम के फैसलों और काम करने के तरीके में कई नैतिक सवाल दिखाई देते हैं। यही जटिलता इस किरदार को दिलचस्प बनाती है।
नाना पाटेकर का अभिनय प्रभावशाली था, लेकिन उन्होंने किरदार को एक सीधी-सादी छवि में नहीं बांधा। तबरेज आलम न तो पारंपरिक अर्थों में नायक है और न ही केवल खलनायक। उसके इरादे और तरीके नैतिक रूप से धुंधले नजर आते हैं।
इस भूमिका के लिए नाना पाटेकर को फिल्मफेयर अवॉर्ड फॉर बेस्ट विलेन से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उनके लंबे और शानदार करियर में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।
प्रकाश झा की राजनीति एक राजनीतिक ड्रामा फिल्म थी, जिसमें कई बड़े कलाकारों ने काम किया था। फिल्म में भारतीय राजनीति की सत्ता, संघर्ष और रिश्तों को दिखाया गया था। इसकी कहानी और किरदारों में महाभारत के कुछ विषयों और रिश्तों की झलक भी देखने को मिलती है।
नाना पाटेकर ने फिल्म में बृज गोपाल का किरदार निभाया था। वह एक अनुभवी राजनीतिक व्यक्ति है, जिसे सत्ता और राजनीति की गहरी समझ है। उसके अनुभव और सोच उसे फिल्म के अपेक्षाकृत शांत और संतुलित किरदारों में शामिल करते हैं।
नाना पाटेकर की यह भूमिका उनके पहले के कई आक्रामक किरदारों से अलग थी। इस बार उन्हें हर दृश्य में टकराव या ऊंची आवाज का सहारा लेने की जरूरत नहीं थी। उन्होंने अपने अभिनय में संयम, नजरों और संवादों के नियंत्रित इस्तेमाल से किरदार को प्रभावशाली बनाया।
बृज गोपाल का किरदार नाना पाटेकर की अभिनय क्षमता का एक और पहलू सामने लाता है। उन्होंने खामोशी, चेहरे के भाव और सोच-समझकर बोले गए संवादों के जरिए किरदार की ताकत को व्यक्त किया।
राजनीति में कई किरदार बहुत प्रभावशाली और बड़े व्यक्तित्व वाले थे। ऐसे माहौल में नाना पाटेकर का अपेक्षाकृत शांत अभिनय बृज गोपाल को जमीन से जुड़ा हुआ और विश्वसनीय बनाता है।
यह भूमिका बताती है कि नाना पाटेकर केवल तेज संवाद या आक्रामक अभिनय के जरिए ही प्रभाव पैदा नहीं करते थे। जरूरत पड़ने पर वह अपने अभिनय को बेहद नियंत्रित रखकर भी दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींच सकते थे।
परिंदा से नाना पाटेकर को देशभर में बड़ी पहचान मिलने से पहले ही वह गंभीर और यथार्थवादी सिनेमा में अपनी जगह बना चुके थे। मीरा नायर की फिल्म सलाम बॉम्बे! उनके शुरुआती करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक थी।
इस फिल्म में नाना पाटेकर ने बाबा का किरदार निभाया था। फिल्म मुंबई की सड़कों पर रहने वाले बच्चों की जिंदगी और उनकी मुश्किल परिस्थितियों पर केंद्रित थी। इसमें समाज के उस हिस्से की वास्तविकता दिखाई गई, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
सलाम बॉम्बे! ने सड़क पर रहने वाले बच्चों की समस्याओं और उनके संघर्ष को दर्शकों के सामने प्रभावी ढंग से रखा। फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली और इसकी कहानी तथा सामाजिक विषयों की काफी सराहना हुई।
नाना पाटेकर के करियर को समझने के लिए सलाम बॉम्बे! बेहद महत्वपूर्ण फिल्म है। इसने यह भी दिखाया कि उनके अभिनय की शुरुआत से ही सामाजिक और वास्तविक विषयों वाली फिल्मों से मजबूत जुड़ाव रहा था।
नाना पाटेकर ने अपने करियर की शुरुआत केवल व्यावसायिक और मनोरंजन प्रधान फिल्मों के सहारे नहीं की। उन्होंने ऐसे चुनौतीपूर्ण किरदारों को भी चुना, जिनमें वास्तविक भावनाओं और परिस्थितियों को पर्दे पर उतारने की जरूरत थी।
सलाम बॉम्बे! जैसी फिल्मों में उनके शुरुआती काम ने उनके गंभीर अभिनेता के रूप में पहचान बनाने में मदद की। आगे चलकर यही गंभीरता और वास्तविकता उनके अभिनय की सबसे बड़ी विशेषताओं में शामिल हुई।
नाना पाटेकर की आवाज उनकी अभिनय पहचान का सबसे खास हिस्सा रही। उनकी आवाज में ऐसा प्रभाव था कि वह एक ही संवाद को अलग-अलग भावनाओं के साथ पेश कर सकते थे। कभी उनकी आवाज बेहद आक्रामक और डरावनी लगती थी, तो कभी उसमें भावनाएं दिखाई देती थीं। वहीं, वेलकम जैसी फिल्मों में उनकी यही आवाज कॉमेडी का अहम हिस्सा बन गई।
नाना पाटेकर केवल संवाद बोलने पर ध्यान नहीं देते थे। वह यह भी समझते थे कि संवाद किस गति से बोला जाए, आवाज कितनी ऊंची या धीमी रखी जाए और कहां कुछ पल रुकना जरूरी है। उनके अभिनय में खामोशी भी कई बार संवाद जितना ही प्रभाव पैदा करती थी।
क्रांतिवीर, परिंदा और अब तक छप्पन जैसी फिल्मों में उनकी संवाद अदायगी का असर साफ दिखाई देता है। वहीं, वेलकम ने यह दिखाया कि उनकी गंभीर और प्रभावशाली आवाज को सही परिस्थिति में इस्तेमाल करके शानदार कॉमेडी भी पैदा की जा सकती है।
नाना पाटेकर के करियर की एक और बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने ऐसे किरदार निभाने से परहेज नहीं किया, जिनमें अच्छाई और बुराई के बीच साफ अंतर नहीं था।
उनके ज्यादातर किरदार पूरी तरह अच्छे या पूरी तरह बुरे नहीं थे। परिंदा का अन्ना खतरनाक था, लेकिन उसके व्यक्तित्व में कई मानसिक परतें भी थीं। क्रांतिवीर का प्रताप नारायण तिलक शुरुआत में निराश और परेशान व्यक्ति था, लेकिन बाद में अन्याय के खिलाफ खड़ा होता है। अब तक छप्पन का साधु आगाशे कठिन और नैतिक रूप से उलझी हुई परिस्थितियों में काम करता है। वहीं वेलकम का उदय शेट्टी एक गैंगस्टर होने के बावजूद दर्शकों को हंसाने वाला किरदार बन जाता है।
यही जटिलता नाना पाटेकर के किरदारों को एक-दूसरे से अलग बनाती थी। वह एक जैसे किरदारों या भावनाओं को बार-बार दोहराने के बजाय हर भूमिका में कुछ नया दिखाने की कोशिश करते थे।
नाना पाटेकर के योगदान को केवल हिंदी फिल्मों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। मराठी थिएटर और सिनेमा से उनका जुड़ाव भी उनके कलात्मक सफर का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
मराठी फिल्म नटसम्राट इस बात का शानदार उदाहरण है। इस फिल्म में उन्होंने एक कठिन और भावनात्मक रंगमंचीय किरदार को पर्दे पर बेहद प्रभावी ढंग से पेश किया। फिल्म ने यह भी दिखाया कि वह मराठी साहित्य और रंगमंच से जुड़े किरदारों को उसी गहराई के साथ निभा सकते थे, जिसके लिए वह हिंदी सिनेमा में जाने जाते थे।
उनके निधन के बाद सामने आई जानकारियों में भी थिएटर के साथ उनके लंबे जुड़ाव और हिंदी तथा मराठी सिनेमा में उनके योगदान को विशेष रूप से याद किया गया।
नाना पाटेकर के अभिनय की नींव थिएटर से मजबूत हुई थी। रंगमंच के अनुभव ने उनके अभिनय में अनुशासन, तैयारी और भावनात्मक तीव्रता को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही गुण बाद में उनकी फिल्मों में भी साफ दिखाई दिए।
उनका रचनात्मक सफर केवल कैमरे के सामने अभिनय करने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने निर्देशन और लेखन में भी काम किया। प्रहार: द फाइनल अटैक इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जिसमें उन्होंने अभिनय के साथ निर्देशन और लेखन में भी योगदान दिया।
इस तरह नाना पाटेकर का भारतीय सिनेमा में योगदान केवल एक अभिनेता के तौर पर नहीं देखा जा सकता। उन्होंने थिएटर, हिंदी सिनेमा, मराठी सिनेमा और फिल्म निर्माण के अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी रचनात्मक पहचान बनाई।
नाना पाटेकर को मिले तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भारतीय सिनेमा में उनके योगदान की बड़ी पहचान हैं।
उन्हें परिंदा के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता, क्रांतिवीर के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और अग्निसाक्षी के लिए एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।
इन पुरस्कारों की खास बात यह है कि तीनों अलग-अलग तरह के अभिनय के लिए मिले। परिंदा में उन्होंने एक ऐसे सहायक खलनायक को यादगार बनाया, जो फिल्म के मुख्य किरदारों के बीच भी अपनी अलग छाप छोड़ता है। क्रांतिवीर में उन्होंने मुख्य भूमिका को अपनी दमदार अदाकारी से पूरी तरह संभाला। वहीं अग्निसाक्षी में उन्होंने सहायक भूमिका के जरिए मनोवैज्ञानिक तनाव और डर को प्रभावी ढंग से पर्दे पर उतारा।
नाना पाटेकर के लंबे फिल्मी सफर को भारत सरकार ने भी सम्मान दिया। उन्हें वर्ष 2013 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
नाना पाटेकर की फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत उनकी विविधता रही। उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार निभाए और हर भूमिका में अपनी अलग पहचान बनाई।
परिंदा में वह डर पैदा करने वाले किरदार में नजर आए। क्रांतिवीर में उन्होंने बदलाव और संघर्ष की आवाज को प्रभावी बनाया। अग्निसाक्षी में उनका किरदार मनोवैज्ञानिक रूप से परेशान करने वाला था। अब तक छप्पन में वह अनुशासन और नैतिक उलझनों से जूझते पुलिस अधिकारी के रूप में दिखाई दिए। राजनीति में उन्होंने शांत लेकिन राजनीतिक रूप से समझदार किरदार निभाया। नटसम्राट में उन्होंने एक बेहद भावुक और कमजोर इंसान की भूमिका निभाई, जबकि वेलकम में उन्होंने दर्शकों को जमकर हंसाया।
बहुत कम अभिनेता ऐसे रहे हैं, जो इतनी अलग-अलग भावनाओं और किरदारों के बीच आसानी से जा सकें और फिर भी अपनी व्यक्तिगत अभिनय पहचान बनाए रखें।
नाना पाटेकर ने कभी खुद को बॉलीवुड के पारंपरिक हीरो की छवि तक सीमित नहीं रखा। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका अभिनय था, न कि केवल उनका चेहरा या ग्लैमर।
उनके किरदार अक्सर ऐसे लोगों जैसे दिखाई देते थे, जिनकी जिंदगी ने उन्हें मुश्किल परिस्थितियों से गुजरने के लिए मजबूर किया हो। उनकी फिल्मों में भले ही ड्रामा काफी मजबूत रहा हो, लेकिन उनके अभिनय में अक्सर वास्तविक जीवन की झलक दिखाई देती थी।
यही स्वाभाविकता उन्हें अलग बनाती थी। इसी वजह से वह अलग-अलग उम्र के दर्शकों और कई तरह की फिल्मों के बीच अपनी जगह बनाने में सफल रहे।
नाना पाटेकर का निधन भारतीय सिनेमा के एक शानदार अध्याय के अंत जैसा है। वह अपने पीछे ऐसी फिल्मी विरासत छोड़ गए, जिसमें गंभीर समानांतर सिनेमा, सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्में, क्राइम थ्रिलर, राजनीतिक ड्रामा और मुख्यधारा की कॉमेडी तक शामिल हैं।
इस लेख में शामिल 10 फिल्में उनके पूरे करियर की हर महत्वपूर्ण भूमिका को नहीं दिखाती हैं। अंकुश, तिरंगा, खामोशी: द म्यूजिकल, यशवंत, शक्ति: द पावर, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, द अटैक्स ऑफ 26/11 और कई अन्य फिल्में भी उनके कलात्मक सफर का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हैं।
फिर भी सलाम बॉम्बे!, परिंदा, प्रहार, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, अब तक छप्पन, अपहरण, राजनीति, वेलकम और नटसम्राट जैसी फिल्में नाना पाटेकर के अभिनय की एक खास तस्वीर सामने रखती हैं।
इन फिल्मों से पता चलता है कि उन्होंने खुद को कभी एक ही तरह की छवि तक सीमित नहीं किया।
नाना पाटेकर दर्शकों को डरा सकते थे, उन्हें हंसा सकते थे, उन्हें असहज कर सकते थे और अपने बेहतरीन अभिनय के जरिए उन्हें सोचने पर भी मजबूर कर सकते थे। उनका अभिनय सिर्फ गुस्से और तीव्रता तक सीमित नहीं था। उनके किरदारों में गुस्सा, हास्य, संघर्ष और टकराव के साथ-साथ इंसानी व्यवहार और भावनाओं की गहरी समझ भी दिखाई देती थी।
अन्ना, प्रताप नारायण तिलक, साधु अगाशे, गणपतराव बेलवलकर और उदय शेट्टी जैसे उनके किरदार भारतीय सिनेमा में लंबे समय तक याद किए जाते रहेंगे।
शायद नाना पाटेकर के लिए इससे बड़ी श्रद्धांजलि कुछ नहीं हो सकती कि उन्हें सिर्फ एक सफल अभिनेता के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे कलाकार के रूप में याद किया जाए, जिन्होंने ऐसे किरदार बनाए जिन्हें दर्शक आसानी से कभी भूल नहीं सके।