कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आज स्वास्थ्य सेवा, वित्त, शिक्षा और परिवहन जैसे लगभग हर क्षेत्र को तेजी से बदल रही है। हालांकि, AI के बढ़ते उपयोग के साथ इसका पर्यावरण पर पड़ने वाला प्रभाव भी एक बड़ी चिंता बनता जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2020 के दशक में AI से जुड़ी ऊर्जा और संसाधनों की बढ़ती मांग टिकाऊ विकास (सस्टेनेबिलिटी) के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन सकती है।
AI के बढ़ते उपयोग के कारण दुनिया भर में बिजली की खपत तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2025 में AI से जुड़े कार्यों का हिस्सा डेटा सेंटरों की कुल बिजली खपत का लगभग 20 प्रतिशत है। अनुमान है कि दशक के अंत तक यह हिस्सा बढ़कर 40 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
AI डेटा सेंटर अत्यधिक संसाधन-आधारित होते हैं। इन्हें बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग के लिए भारी मात्रा में बिजली की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, हजारों सर्वरों को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी का उपयोग किया जाता है और इन केंद्रों के निर्माण व संचालन के लिए विशाल भूमि की भी जरूरत पड़ती है।
वर्ष 2025 में प्रकाशित कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के एक महत्वपूर्ण अध्ययन के अनुसार, यदि AI का विकास वर्तमान गति से जारी रहता है, तो वर्ष 2030 तक हर साल 2.4 करोड़ से 4.4 करोड़ मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में उत्सर्जित हो सकती है। यह उत्सर्जन अमेरिका की सड़कों पर अतिरिक्त 50 लाख से 1 करोड़ कारों के चलने के बराबर होगा।
अध्ययन में यह भी बताया गया है कि AI से जुड़े डेटा सेंटर हर वर्ष लगभग 731 मिलियन से 1,125 मिलियन घन मीटर पानी की खपत कर सकते हैं। यह मात्रा लगभग 60 लाख से 1 करोड़ अमेरिकी परिवारों की वार्षिक घरेलू जल खपत के बराबर है।
संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी इस बढ़ती चुनौती को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। संगठन का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक डेटा सेंटरों की कुल बिजली मांग लगभग दोगुनी हो सकती है। इससे करीब 40 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होगा, जो वैश्विक तापमान वृद्धि को और तेज कर सकता है।
इसके अलावा, डेटा सेंटरों द्वारा लगभग 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी की खपत होने का अनुमान है। यह इतनी बड़ी मात्रा है कि इससे पृथ्वी की 8.1 अरब आबादी की लगभग 1.6 वर्षों की पीने के पानी की जरूरत पूरी की जा सकती है।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि AI तकनीक जहां एक ओर नवाचार और आर्थिक विकास को बढ़ावा दे रही है, वहीं दूसरी ओर इसके पर्यावरणीय प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भविष्य में AI के सतत और जिम्मेदार विकास के लिए ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग और बेहतर कूलिंग तकनीकों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा।
AI का बढ़ता उपयोग और पर्यावरण पर उसका असर: क्या हम तैयार हैं? (The Growing Use of AI and Its Impact on the Environment: Are We Ready?)
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) सिस्टम बड़ी मात्रा में गर्मी उत्पन्न करते हैं। इसका मुख्य कारण विद्युत प्रतिरोध (Electrical Resistance) है। जब AI प्रोसेसर, विशेष रूप से GPU और विशेष AI चिप्स, जटिल गणनाएँ करते हैं, तो बिजली का एक हिस्सा गणना में उपयोग होता है और शेष ऊर्जा गर्मी के रूप में निकलती है। जितनी अधिक गणना होगी, उतनी ही अधिक गर्मी पैदा होगी।
| मापदंड | आँकड़ा |
|---|---|
| प्रति AI सर्वर गर्मी उत्पादन | 30–50 किलोवाट (उच्च प्रदर्शन वाले सर्वर) |
| प्रति रैक गर्मी घनत्व | 100–400 किलोवाट (AI डेटा सेंटर) |
| पारंपरिक डेटा सेंटर रैक | 5–15 किलोवाट |
| ऊष्मा स्थानांतरण क्षमता | तरल शीतलन (Liquid Cooling) हवा की तुलना में लगभग 1,000 गुना अधिक प्रभावी |
AI डेटा सेंटर सामान्य डेटा सेंटरों की तुलना में अधिक तापमान पर काम करते हैं।
सामान्य डेटा सेंटर का तापमान: 18–27°C।
AI डेटा सेंटर का तापमान: 30–45°C।
इसका कारण यह है कि AI सर्वरों में बहुत अधिक कंप्यूटिंग शक्ति एक ही स्थान पर केंद्रित होती है।
AI मॉडल हर सेकंड अरबों गणनाएँ करते हैं।
बड़े भाषा मॉडल (LLMs) को भारी मात्रा में समानांतर प्रोसेसिंग की आवश्यकता होती है।
एक बड़े AI मॉडल का प्रशिक्षण (Training) कई बार उतनी बिजली खर्च कर सकता है जितनी 100 से अधिक घर एक वर्ष में उपयोग करते हैं।
AI सर्वरों में बहुत अधिक संख्या में GPU लगे होते हैं।
एक AI सर्वर में 8 से 64 GPU तक हो सकते हैं।
प्रत्येक GPU संचालन के दौरान लगभग 250–500 वाट बिजली खपत करता है।
इसके विपरीत, पारंपरिक सर्वर सामान्यतः 1–2 CPU का उपयोग करते हैं, जिनकी खपत 100–200 वाट होती है।
AI सिस्टम लगातार 24 घंटे और सप्ताह के सातों दिन काम करते हैं।
प्रशिक्षण और उपयोग (Inference) दोनों प्रक्रियाएँ लगातार चलती रहती हैं।
सिस्टम को ठंडा होने के लिए बहुत कम समय मिलता है।
इससे लगातार गर्मी उत्पन्न होती रहती है।
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AI डेटा सेंटरों को लगातार ठंडा रखना आवश्यक है। यदि ऐसा न किया जाए तो कई समस्याएँ हो सकती हैं।
हार्डवेयर खराब हो सकता है क्योंकि प्रोसेसर 85°C से ऊपर गर्म होने पर क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।
प्रदर्शन में गिरावट आ सकती है क्योंकि सिस्टम गति कम कर देता है।
लंबे समय तक अधिक तापमान रहने से उपकरण स्थायी रूप से खराब हो सकते हैं।
वर्ष 2030 तक शीतलन के लिए 731 से 1,125 मिलियन घन मीटर पानी की आवश्यकता हो सकती है।
कई डेटा सेंटरों में कुल बिजली खपत का 40% हिस्सा केवल कूलिंग पर खर्च होता है।
एक बड़े डेटा सेंटर को प्रतिदिन अरबों BTU गर्मी बाहर निकालनी पड़ती है।
यूरोपीय आयोग के मार्च 2026 European Commission (March 2026) के शोध के अनुसार, AI डेटा सेंटरों से निकलने वाली अतिरिक्त गर्मी का उपयोग कई उपयोगी कार्यों में किया जा सकता है।
जल शुद्धिकरण और आसवन प्रक्रियाएँ।
कार्बन कैप्चर तकनीकों को सक्रिय करना।
आसपास की इमारतों को गर्म रखने के लिए जिला हीटिंग (District Heating)।
यदि इन तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए, तो डेटा सेंटर केवल संसाधन खपत करने वाले केंद्र नहीं रहेंगे, बल्कि ऊर्जा पुनर्चक्रण के स्रोत भी बन सकते हैं। हालांकि अभी इसका उपयोग सीमित स्तर पर ही हो रहा है।
| मापदंड | 2025 का आँकड़ा |
|---|---|
| वैश्विक डेटा सेंटर बिजली खपत | 448 ट्रिलियन वाट-घंटे (kWh) |
| AI से संबंधित बिजली खपत | कुल का लगभग 20% |
| बिजली से उत्पन्न कार्बन उत्सर्जन | 208 मिलियन टन CO₂ |
| तुलना | अर्जेंटीना के वार्षिक उत्सर्जन के बराबर |
वैश्विक डेटा सेंटरों से उत्पन्न 208 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन दुनिया के कई बड़े देशों के वार्षिक उत्सर्जन के बराबर है।
यह आँकड़ा दिखाता है कि AI और डेटा सेंटर उद्योग केवल तकनीकी विकास का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं।
जैसे-जैसे AI का उपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे अधिक बिजली, अधिक पानी और अधिक शीतलन अवसंरचना की आवश्यकता होगी। यही कारण है कि दुनिया भर की सरकारें, पर्यावरण विशेषज्ञ और तकनीकी कंपनियाँ अब "ग्रीन AI" और टिकाऊ डेटा सेंटरों पर अधिक ध्यान दे रही हैं। ।
AI और डेटा सेंटर उद्योग की तेज़ वृद्धि के कारण आने वाले वर्षों में बिजली की मांग में भारी बढ़ोतरी होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्तमान रफ्तार जारी रही, तो 2030 तक AI दुनिया के सबसे बड़े बिजली उपभोक्ताओं में शामिल हो सकता है।
संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान (UNU-INWEH) UN University Institute for Water, Environment and Health (UNU-INWEH) report की जून 2026 की रिपोर्ट के अनुसार:
2025 में डेटा सेंटरों की कुल बिजली खपत में AI की हिस्सेदारी लगभग 20% है।
2030 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 40% हो सकती है।
2030 तक डेटा सेंटरों की कुल बिजली मांग लगभग दोगुनी हो सकती है।
केवल AI से जुड़ी बिजली खपत इतनी हो सकती है कि उससे उप-सहारा अफ्रीका (Sub-Saharan Africa) के 1.3 अरब लोगों की घरेलू बिजली जरूरतें दो वर्षों से अधिक समय तक पूरी की जा सकें।
2025: कुल डेटा सेंटर बिजली उपयोग में AI की हिस्सेदारी लगभग 20%।
2030: कुल बिजली मांग लगभग दोगुनी और AI की हिस्सेदारी लगभग 40% होने का अनुमान।
यह दर्शाता है कि AI भविष्य में वैश्विक बिजली नेटवर्क पर बड़ा दबाव डाल सकता है।
2030 तक डेटा सेंटरों की बढ़ती बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए जितनी ऊर्जा उत्पन्न करनी होगी, उससे लगभग 400 मिलियन टन (40 करोड़ टन) कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित हो सकती है।
इस उत्सर्जन की भरपाई के लिए लगभग 6.7 अरब पेड़ दस वर्षों तक उगाने पड़ेंगे।
यह संख्या पूरे यूनाइटेड किंगडम में मौजूद पेड़ों की संख्या से लगभग दोगुनी है।
नवंबर 2025 में कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं Cornell University's November 2025 research ने भी इसी तरह की चेतावनी दी थी।
अध्ययन के अनुसार:
2030 तक AI उद्योग हर वर्ष 24 से 44 मिलियन मीट्रिक टन CO₂ उत्सर्जित कर सकता है।
यह अमेरिका की सड़कों पर 50 लाख से 1 करोड़ अतिरिक्त कारों के जुड़ने के बराबर होगा।
यदि वर्तमान गति जारी रही, तो AI उद्योग के लिए "नेट-जीरो" उत्सर्जन लक्ष्य हासिल करना बेहद कठिन हो जाएगा।
संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि केवल कम-कार्बन (Low-Carbon) बिजली का उपयोग करने से AI पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल नहीं बन जाएगा।
कारण यह है कि डेटा सेंटर अभी भी बड़ी मात्रा में संसाधनों का उपयोग करते हैं:
कूलिंग के लिए पानी।
डेटा सेंटर और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए भूमि।
ऊर्जा उत्पादन और वितरण के लिए अतिरिक्त बुनियादी ढाँचा।
इसलिए केवल कार्बन उत्सर्जन कम करना पर्याप्त नहीं है। पानी, भूमि और ऊर्जा—तीनों का संतुलित प्रबंधन आवश्यक है।
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के अध्ययन के अनुसार, यदि दुनिया बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा अपनाती है, तब भी चुनौतियाँ बनी रहेंगी।
2030 तक:
कार्बन उत्सर्जन में केवल लगभग 15% की कमी आ सकती है।
फिर भी लगभग 1.1 करोड़ टन CO₂ उत्सर्जन शेष रहेगा।
नेट-जीरो लक्ष्य हासिल करने के लिए 28 गीगावाट पवन ऊर्जा या 43 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता अतिरिक्त विकसित करनी होगी।
कॉर्नेल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर फेंगची यू के अनुसार:
"समाधान यह है कि जिन क्षेत्रों में AI कंप्यूटिंग तेजी से बढ़ रही है, वहीं स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन की गति भी तेज की जाए।"
AI डेटा सेंटर मुख्य रूप से निम्नलिखित कार्यों के लिए पानी का उपयोग करते हैं:
कूलिंग सिस्टम (Cooling Systems)।
सर्वरों के लिए उपयुक्त आर्द्रता बनाए रखना।
बिजली उत्पादन, विशेषकर जलविद्युत या परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से जुड़ी प्रणालियों में।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2030 तक दुनिया भर के डेटा सेंटर हर वर्ष लगभग 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी का उपयोग कर सकते हैं।
| तुलना | अनुमानित मात्रा |
|---|---|
| पीने के पानी के बराबर | पृथ्वी के 8.1 अरब लोगों की लगभग 1.6 वर्षों की जरूरत |
| घरेलू उपयोग के बराबर | 60 लाख से 1 करोड़ अमेरिकियों की वार्षिक जल खपत |
| कुल मात्रा | 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी |
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के अनुसार:
AI उद्योग 2030 तक हर वर्ष 731 से 1,125 मिलियन घन मीटर पानी उपयोग कर सकता है।
यह लगभग 731 से 1,125 अरब लीटर पानी के बराबर है।
हालाँकि यह अनुमान संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े से थोड़ा कम है, लेकिन दोनों अध्ययन इस बात पर सहमत हैं कि जल संकट एक गंभीर चिंता बनने वाला है।
अमेरिका का सबसे बड़ा डेटा सेंटर हब उत्तरी वर्जीनिया कई चुनौतियों का सामना कर रहा है।
मुख्य समस्याएँ:
बड़ी संख्या में डेटा सेंटरों का एक ही क्षेत्र में केंद्रित होना।
स्थानीय जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव।
घरेलू, कृषि और औद्योगिक उपयोगकर्ताओं के बीच पानी के लिए प्रतिस्पर्धा।
पहले से ही जल तनाव (Water Stress) वाले क्षेत्रों में मांग का बढ़ना।
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, यदि नए डेटा सेंटर कम जल तनाव वाले क्षेत्रों में बनाए जाएँ और अधिक कुशल कूलिंग तकनीक अपनाई जाए, तो:
केवल बेहतर स्थान चयन से पानी की मांग लगभग 52% तक कम की जा सकती है।
बेहतर ऊर्जा ग्रिड और संचालन रणनीतियों के साथ कुल जल उपयोग में 86% तक कमी संभव है।
| राज्य | जल तनाव स्तर | डेटा सेंटरों का प्रभाव |
|---|---|---|
| वर्जीनिया | उच्च | अत्यधिक (665 से अधिक डेटा सेंटर) |
| टेक्सास | मध्यम से उच्च | उच्च (413 डेटा सेंटर) |
| कैलिफोर्निया | उच्च | उच्च (321 डेटा सेंटर) |
| इलिनॉय | मध्यम | मध्यम (123 डेटा सेंटर) |
| जॉर्जिया | मध्यम | उच्च (141 प्रस्तावित डेटा सेंटर) |
इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि AI की प्रगति केवल तकनीकी अवसर नहीं, बल्कि ऊर्जा और जल संसाधनों के लिए एक बड़ी चुनौती भी है। आने वाले वर्षों में टिकाऊ (Sustainable) डेटा सेंटर, स्वच्छ ऊर्जा और जल संरक्षण तकनीकों का विकास AI उद्योग की सफलता के लिए उतना ही महत्वपूर्ण होगा जितना कि नए और शक्तिशाली AI मॉडल विकसित करना। ।
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, अमेरिका के मिडवेस्ट (Midwest) और "विंडबेल्ट" (Windbelt) क्षेत्र ऐसे स्थान हैं जहाँ डेटा सेंटर अपेक्षाकृत कम पर्यावरणीय प्रभाव डाल सकते हैं। इन राज्यों में कार्बन उत्सर्जन और जल उपयोग दोनों का संतुलन बेहतर माना जाता है।
टेक्सास (Texas) – पवन ऊर्जा की प्रचुर उपलब्धता और मध्यम जल दबाव।
मोंटाना (Montana) – कम जल तनाव और अधिक नवीकरणीय ऊर्जा।
नेब्रास्का (Nebraska) – कम जल दबाव और मजबूत पवन ऊर्जा क्षमता।
साउथ डकोटा (South Dakota) – पर्याप्त नवीकरणीय ऊर्जा और अपेक्षाकृत कम जल संकट।
जल संसाधनों की बेहतर उपलब्धता।
पवन ऊर्जा जैसी स्वच्छ ऊर्जा के बड़े स्रोत।
अपेक्षाकृत ठंडी जलवायु, जिससे कूलिंग की आवश्यकता कम होती है।
डेटा सेंटर निर्माण के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध।
| राज्य | सक्रिय डेटा सेंटर | प्रस्तावित डेटा सेंटर |
|---|---|---|
| वर्जीनिया | 665 से अधिक | 287 |
| टेक्सास | 413 | 170 |
| कैलिफोर्निया | 321 | जानकारी उपलब्ध नहीं |
| इलिनॉय | 123 | 123 |
| जॉर्जिया | जानकारी उपलब्ध नहीं | 141 |
2026 तक अमेरिका में कुल 4,500 से अधिक सक्रिय डेटा सेंटर मौजूद हैं।
उत्तरी वर्जीनिया को अक्सर "डेटा सेंटर एली" (Data Centre Alley) कहा जाता है। यह क्षेत्र कई कारणों से AI उद्योग का प्रमुख केंद्र बन गया है।
1990 के दशक से विकसित डेटा सेंटर हब।
वॉशिंगटन डी.सी. के निकट होने के कारण सरकारी और कॉर्पोरेट ग्राहकों तक आसान पहुँच।
फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क का मजबूत ढाँचा।
बिजली की पर्याप्त उपलब्धता।
व्यवसायों के लिए अनुकूल कर नीतियाँ।
कूलिंग के लिए पानी की सीमित उपलब्धता।
बिजली ग्रिड पर बढ़ता दबाव।
घरेलू और कृषि उपयोगकर्ताओं के साथ जल संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा।
Pew Research Finding (April 2026) अप्रैल 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में बनने वाले अधिकांश नए डेटा सेंटर अब ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित किए जा रहे हैं।
| रैंक | राज्य | प्रस्तावित डेटा सेंटर |
|---|---|---|
| 1 | वर्जीनिया | 287 |
| 2 | टेक्सास | 170 |
| 3 | जॉर्जिया | 141 |
| 4 | इलिनॉय | 123 |
भूमि की कम लागत।
पानी के लिए कम प्रतिस्पर्धा।
अपेक्षाकृत ठंडी जलवायु।
बिजली आपूर्ति की उपलब्ध क्षमता।
स्थानीय सरकारों द्वारा कर प्रोत्साहन।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, AI कंप्यूटिंग अवसंरचना दुनिया में समान रूप से वितरित नहीं है।
केवल 32 देशों में AI-विशेषीकृत क्लाउड अवसंरचना मौजूद है।
वैश्विक AI कंप्यूटिंग क्षमता का लगभग 90% हिस्सा केवल अमेरिका और चीन के पास है।
150 से अधिक देशों के पास अपनी स्वतंत्र AI कंप्यूटिंग क्षमता नहीं है।
वैज्ञानिकों ने AI क्षेत्र में दो प्रकार के देशों के बीच बढ़ती असमानता की पहचान की है।
| देश का प्रकार | विशेषता |
|---|---|
| AI निर्माता (AI Builders) | अमेरिका, चीन और लगभग 30 अन्य विकसित देश |
| AI उपभोक्ता (AI Consumers) | 150 से अधिक देश जिनके पास अपनी AI अवसंरचना नहीं है |
| पर्यावरणीय बोझ | खनन और ई-कचरे का प्रभाव विकासशील देशों पर, जबकि लाभ विकसित देशों को मिलता है |
इस स्थिति में विकासशील देश खनिज संसाधनों के दोहन और ई-कचरे का बोझ उठाते हैं, जबकि AI से मिलने वाले रणनीतिक और आर्थिक लाभ मुख्य रूप से विकसित देशों को प्राप्त होते हैं।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार AI का पर्यावरणीय प्रभाव केवल बिजली खपत तक सीमित नहीं है।
इसके पीछे कई अन्य कारक भी हैं:
सेमीकंडक्टर और चिप निर्माण।
लिथियम, कोबाल्ट, तांबा और रेयर अर्थ तत्वों जैसे खनिजों का खनन।
पुराने हार्डवेयर से उत्पन्न इलेक्ट्रॉनिक कचरा।
एक सेमीकंडक्टर फैक्ट्री प्रतिदिन 40 लाख से 1 करोड़ गैलन पानी तक उपयोग कर सकती है।
निर्माण प्रक्रिया में विषैले रसायनों और अम्लों का उपयोग होता है।
अत्यधिक शुद्ध उत्पादन प्रक्रियाओं के लिए बड़ी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
खतरनाक अपशिष्ट पदार्थों के सुरक्षित निपटान की आवश्यकता होती है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 2030 तक AI अवसंरचना हर वर्ष लगभग 25 लाख टन (2.5 मिलियन टन) ई-कचरा उत्पन्न कर सकती है।
2022 में वैश्विक ई-कचरा लगभग 5 करोड़ टन था।
2030 तक AI अकेले वैश्विक ई-कचरे का लगभग 5% हिस्सा उत्पन्न कर सकता है।
AI हार्डवेयर के तेज़ी से बदलने के कारण यह समस्या लगातार बढ़ती जाएगी।
हर 1–2 वर्ष में अधिक शक्तिशाली AI चिप्स बाजार में आ जाती हैं, जिससे पुराने हार्डवेयर जल्दी अप्रासंगिक हो जाते हैं।
नए AI मॉडल अधिक शक्तिशाली हार्डवेयर की मांग करते हैं, जिन्हें पुराने सिस्टम संभाल नहीं पाते।
GPU लगातार भारी कार्यभार के कारण तेजी से घिसते हैं और उनकी कार्यक्षमता कम होने लगती है।
AI सर्वरों का औसत जीवनकाल लगभग 3 से 5 वर्ष होता है, जबकि पारंपरिक सर्वर अक्सर 10 वर्ष या उससे अधिक समय तक उपयोग किए जा सकते हैं।
इस प्रकार AI क्रांति केवल तकनीकी प्रगति की कहानी नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा, पानी, भूमि और ई-कचरे जैसी पर्यावरणीय चुनौतियों को भी सामने ला रही है। इसलिए भविष्य में टिकाऊ AI विकास (Sustainable AI Development) वैश्विक नीति और तकनीकी नवाचार का एक महत्वपूर्ण विषय बनने वाला है। ।
| खनिज | उपयोग | पर्यावरणीय प्रभाव |
|---|---|---|
| लिथियम (Lithium) | बैटरियों और कूलिंग सिस्टम में | जल संसाधनों की कमी और मिट्टी प्रदूषण। |
| कोबाल्ट (Cobalt) | इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में | बाल श्रम की समस्या और जहरीले कचरे का उत्पादन। |
| तांबा (Copper) | वायरिंग और कनेक्टिविटी में | अम्लीय खदान जल निकासी और वनों की कटाई। |
| रेयर अर्थ एलिमेंट्स (Rare Earth Elements) | मैग्नेट और प्रोसेसर में | रेडियोधर्मी कचरा और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान। |
कोबाल्ट (Cobalt): विश्व आपूर्ति का लगभग 70% हिस्सा Democratic Republic of the Congo से आता है।
लिथियम (Lithium): मुख्य रूप से Chile, Australia और Argentina के "लिथियम त्रिकोण" क्षेत्र से प्राप्त होता है।
रेयर अर्थ एलिमेंट्स (Rare Earth Elements): विश्व की लगभग 85% आपूर्ति China से आती है।
एक बड़ी चिंता यह है कि जिन 150 से अधिक देशों के पास अपना AI इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, वे अक्सर खनिज खनन और ई-वेस्ट के पर्यावरणीय बोझ को झेलते हैं। दूसरी ओर, AI तकनीक के आर्थिक और रणनीतिक लाभ मुख्य रूप से उन देशों को मिलते हैं जो AI विकसित और संचालित कर रहे हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यदि सही रणनीतियाँ अपनाई जाएँ तो सबसे खराब स्थिति की तुलना में:
कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 73% तक कमी लाई जा सकती है।
पानी की खपत में लगभग 86% तक कमी लाई जा सकती है।
इसके लिए तीन प्रमुख क्षेत्रों पर एक साथ काम करना होगा:
सही स्थान का चयन (Smart Siting)।
स्वच्छ ऊर्जा का तेज़ी से विस्तार (Grid Decarbonization)।
संचालन दक्षता में सुधार (Operational Efficiency)।
ऐसे क्षेत्र जहाँ पानी की उपलब्धता अधिक हो और स्थानीय लोगों से प्रतिस्पर्धा न हो।
ऐसे स्थान जहाँ पवन, सौर या जलविद्युत जैसी नवीकरणीय ऊर्जा उपलब्ध हो।
ठंडे मौसम वाले क्षेत्र, जहाँ कूलिंग की आवश्यकता कम हो।
पर्याप्त भूमि उपलब्ध हो।
बिजली ग्रिड की क्षमता मजबूत हो।
कॉर्नेल के अनुसार निम्न अमेरिकी राज्य AI डेटा सेंटरों के लिए सबसे उपयुक्त हैं:
टेक्सास (Texas): प्रचुर पवन ऊर्जा और मध्यम जल दबाव।
मोंटाना (Montana): कम जल संकट और अधिक नवीकरणीय ऊर्जा।
नेब्रास्का (Nebraska): पर्याप्त जल उपलब्धता और पवन ऊर्जा।
साउथ डकोटा (South Dakota): मजबूत नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता और कम जल दबाव।
2030 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने के लिए AI उद्योग को आवश्यकता होगी:
28 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता, या
43 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता।
टेक्सास: अमेरिका की सबसे बड़ी पवन ऊर्जा क्षमता।
मोंटाना: जलविद्युत और पवन ऊर्जा दोनों उपलब्ध।
नेब्रास्का: पवन और सौर ऊर्जा की बड़ी संभावनाएँ।
साउथ डकोटा: पवन ऊर्जा का समृद्ध स्रोत।
कॉर्नेल इंजीनियरिंग के फेंगकी यू के अनुसार:
"कोई एक जादुई समाधान नहीं है। सही स्थान का चयन, स्वच्छ बिजली ग्रिड और कुशल संचालन मिलकर ही कार्बन उत्सर्जन में लगभग 73% और पानी की खपत में 86% तक कमी ला सकते हैं।"
लिक्विड कूलिंग नई पीढ़ी के AI प्रोसेसरों को अधिक कुशल, टिकाऊ और घनत्व वाले वातावरण में ठंडा रखने के लिए सबसे प्रभावी तकनीकों में से एक है।
| मापदंड | एयर कूलिंग | लिक्विड कूलिंग | सुधार |
|---|---|---|---|
| CO₂ उत्सर्जन | 8,700 टन/वर्ष | 1,200 टन/वर्ष | 87% कमी |
| प्रति सर्वर वार्षिक लागत | $254.70 | $45.99 | 86% बचत |
| 5-वर्षीय ऊर्जा खपत | आधार स्तर | 14.9% कम | 14.9% कमी |
| प्रति किलोवाट प्रदर्शन | आधार स्तर | 20.7% अधिक | 20.7% सुधार |
इस तकनीक में ठंडी हवा फेंकने के बजाय विशेष कूलेंट को सीधे चिप्स और गर्म होने वाले हिस्सों तक पहुँचाया जाता है। इससे गर्मी तेजी से बाहर निकलती है और सिस्टम अधिक कुशल बनता है।
तरल पदार्थ हवा की तुलना में लगभग 1,000 गुना अधिक प्रभावी तरीके से गर्मी को स्थानांतरित कर सकते हैं।
अधिक घनत्व वाले सर्वर रैक बनाए जा सकते हैं।
बेहतर प्रदर्शन मिलता है।
कूलिंग दक्षता में बड़ा सुधार होता है।
डायरेक्ट-टू-चिप सिस्टम कूलिंग ऊर्जा को 30% से 60% तक कम कर सकते हैं।
यदि कूलिंग तापमान 20°C बढ़ा दिया जाए तो कुल कूलिंग ऊर्जा में 40% कमी और पानी की खपत में 60% कमी आ सकती है।
स्मार्ट साइटिंग के साथ मिलकर कुल जल उपयोग में 86% तक कमी संभव है।
भविष्य में निम्न तकनीकें AI डेटा सेंटरों को और अधिक पर्यावरण-अनुकूल बना सकती हैं:
इमर्शन कूलिंग (Immersion Cooling)।
टू-फेज कूलिंग (Two-Phase Cooling)।
मेम्ब्रेन आधारित कूलिंग (Membrane-Based Cooling)।
हीट रिकवरी सिस्टम, जिनसे अपशिष्ट गर्मी का उपयोग जल शुद्धिकरण या अन्य कार्यों में किया जा सकता है।
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, यदि सही स्थान चयन, स्वच्छ ऊर्जा और उन्नत तकनीकों को एक साथ लागू किया जाए, तो पर्यावरणीय प्रभाव में बड़ी कमी लाई जा सकती है।
कार्बन उत्सर्जन में लगभग 73% तक कमी लाई जा सकती है।
तकनीकी सुधारों से लगभग 7% कमी।
सही स्थान चयन और स्वच्छ बिजली ग्रिड से लगभग 66% अतिरिक्त कमी।
पानी की खपत में लगभग 86% तक कमी लाई जा सकती है।
तकनीकी सुधारों से लगभग 32% कमी।
सही स्थान चयन और ऊर्जा रणनीतियों से लगभग 54% अतिरिक्त कमी।
यदि केवल नई तकनीकों का उपयोग किया जाए तो:
कार्बन उत्सर्जन में लगभग 7% कमी।
पानी की खपत में लगभग 29% कमी।
जब लिक्विड कूलिंग जैसी तकनीकों को अन्य रणनीतियों के साथ जोड़ा जाता है, तो पानी की कुल खपत में लगभग 32% तक कमी संभव हो जाती है।
यह स्पष्ट करता है कि केवल तकनीक समस्या का समाधान नहीं कर सकती। सही स्थान का चयन और स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग भी उतना ही आवश्यक है।
संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि AI का विकास तभी टिकाऊ होगा जब सरकारें और उद्योग मिलकर व्यापक योजना बनाएँ।
सरकारों को AI इंफ्रास्ट्रक्चर संबंधी निर्णयों को निम्न क्षेत्रों के साथ जोड़ना चाहिए:
ऊर्जा योजना।
जल प्रबंधन।
भूमि उपयोग और अनुमति प्रणाली।
सरकारों को निम्न पर्यावरणीय कारकों को निवेश जोखिम के रूप में देखना चाहिए:
बिजली की खपत।
कार्बन उत्सर्जन।
पानी का उपयोग।
भूमि की आवश्यकता।
डेटा सेंटर स्थापित करने से पहले स्थानीय समुदायों और नागरिक संगठनों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए।
कंपनियों को AI सिस्टम विकसित करते समय पर्यावरणीय प्रभावों पर ध्यान देना चाहिए:
हल्के और कम संसाधन उपयोग करने वाले मॉडल चुनना।
अधिक ऊर्जा-कुशल आउटपुट तैयार करना।
उपयोगकर्ताओं की क्वेरी को अधिक कुशल सर्वरों तक भेजना।
बाद में सुधार करने के बजाय शुरुआत से ही दक्षता को डिजाइन का हिस्सा बनाना।
स्थान और ऊर्जा स्रोतों को केवल व्यावसायिक नहीं बल्कि पर्यावरणीय निर्णय भी मानना।
उपयोगकर्ता भी AI के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने में योगदान दे सकते हैं:
कार्य के लिए आवश्यक सबसे छोटे और कुशल AI मॉडल का उपयोग करें।
कम ऊर्जा खपत वाले विकल्प चुनें।
उदाहरण के लिए, बड़े मॉडल की बजाय छोटे AI मॉडल का उपयोग करने से कंप्यूटिंग आवश्यकता 50% से 80% तक कम हो सकती है।
निवेशकों को बिजली, कार्बन, पानी और भूमि उपयोग से जुड़े जोखिमों को वित्तीय जोखिम मानकर निवेश निर्णय लेने चाहिए।
डेटा सेंटरों के बढ़ते पर्यावरणीय प्रभाव के कारण 2026 में QuitGPT आंदोलन ने गति पकड़नी शुरू की।
"जब QuitGPT आंदोलन तेज़ी से बढ़ रहा है, तो क्या पर्यावरण को लेकर चिंतित लोगों को AI का उपयोग कम करने पर विचार करना चाहिए?"
गैर-जरूरी AI उपयोग को कम करना।
जहाँ संभव हो, AI आधारित टूल्स की जगह पारंपरिक तरीकों का उपयोग करना।
उन कंपनियों का समर्थन करना जो पर्यावरण-अनुकूल AI विकसित कर रही हैं।
डेटा सेंटरों के पर्यावरणीय प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए बेहतर नीतियों की मांग करना।
केवल आवश्यकता होने पर ही AI का उपयोग करें।
छोटे और ऊर्जा-कुशल AI मॉडल चुनें।
AI आधारित इमेज जनरेशन का सीमित उपयोग करें, क्योंकि यह अत्यधिक ऊर्जा खपत करता है।
व्यक्तिगत AI मॉडल प्रशिक्षण से बचें, क्योंकि इसमें बहुत अधिक संसाधन लगते हैं।
उन कंपनियों का समर्थन करें जो नवीकरणीय ऊर्जा आधारित डेटा सेंटर संचालित करती हैं।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता का पर्यावरणीय प्रभाव 2020 के दशक की सबसे बड़ी स्थिरता चुनौतियों में से एक बनता जा रहा है। जैसे-जैसे AI समाज के हर क्षेत्र में विस्तार कर रहा है, उसकी ऊर्जा, पानी और संसाधनों की मांग भी तेजी से बढ़ रही है।
2025 में AI से जुड़े कार्य डेटा सेंटरों की कुल बिजली खपत का लगभग 20% हिस्सा थे। यह आंकड़ा 2030 तक बढ़कर 40% तक पहुँच सकता है। इसी अवधि में डेटा सेंटर लगभग 400 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित कर सकते हैं, 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी का उपयोग कर सकते हैं और 2.5 मिलियन टन ई-वेस्ट उत्पन्न कर सकते हैं।
AI डेटा सेंटर प्रति सर्वर 30 से 50 किलोवाट तक गर्मी पैदा करते हैं।
यह पारंपरिक सर्वरों की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक है।
लिक्विड कूलिंग से ऊर्जा उपयोग में 87% तक कमी लाई जा सकती है।
2030 तक डेटा सेंटरों की बिजली मांग लगभग दोगुनी हो सकती है।
AI की हिस्सेदारी 20% से बढ़कर 40% हो सकती है।
2030 तक AI डेटा सेंटरों द्वारा 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी उपयोग किए जाने का अनुमान है।
यह पृथ्वी के 8.1 अरब लोगों की लगभग 1.6 वर्ष की पेयजल आवश्यकता के बराबर है।
2030 तक AI उद्योग से हर वर्ष 24 से 44 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन हो सकता है।
यह अमेरिका की सड़कों पर 50 लाख से 1 करोड़ अतिरिक्त कारों के बराबर प्रभाव डाल सकता है।
2030 तक AI हार्डवेयर से प्रति वर्ष 2.5 मिलियन टन ई-वेस्ट उत्पन्न होने का अनुमान है।
दुनिया की 90% AI क्षमता केवल अमेरिका और चीन में केंद्रित है।
150 से अधिक देशों के पास अपना AI इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है।
सही स्थान चयन।
स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार।
लिक्विड कूलिंग तकनीक।
इनके संयोजन से 73% कार्बन और 86% पानी की बचत संभव है।
समाधान AI के विकास को रोकना नहीं है, बल्कि उन क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार को तेज़ करना है जहाँ AI कंप्यूटिंग तेजी से बढ़ रही है।
इसके लिए आवश्यक है:
कम जल दबाव वाले और नवीकरणीय ऊर्जा से समृद्ध क्षेत्रों में डेटा सेंटर स्थापित करना।
लिक्विड कूलिंग जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग करना।
28 गीगावाट पवन ऊर्जा या 43 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता विकसित करना।
यदि सरकारें, उद्योग और उपयोगकर्ता मिलकर कार्य करें, तो AI उद्योग नेट-ज़ीरो उत्सर्जन के लक्ष्य के करीब पहुँच सकता है और साथ ही समाज को उसके लाभ भी मिलते रहेंगे।
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी स्पष्ट है। यदि अभी कदम नहीं उठाए गए, तो AI का बढ़ता पर्यावरणीय प्रभाव वैश्विक नेट-ज़ीरो लक्ष्यों को हासिल करना बेहद कठिन बना सकता है। हमारे सामने दो रास्ते हैं—अनियंत्रित और अस्थिर विकास, या फिर ऐसी रणनीतिक और जिम्मेदार प्रगति जो तकनीकी विकास और पर्यावरणीय संतुलन दोनों को साथ लेकर चले।