वैश्विक संरक्षण के इस बड़े मंच पर भारत हमेशा से एक महत्वपूर्ण देश रहा है। दुनिया के कुछ चुनिंदा “मेगाडायवर्स” देशों में शामिल भारत की जैव विविधता बहुत समृद्ध है। यहां हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर सुंदरबन के मैंग्रोव जंगलों तक अलग-अलग प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्र पाए जाते हैं।
लेकिन जैव विविधता कोई स्थिर संपत्ति नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा तंत्र है जो लगातार बदलता रहता है और इस समय कई तरह के दबावों का सामना कर रहा है। हाल ही में भारत ने जैव विविधता पर अपनी भारत की 7वीं बायोडायवर्सिटी रिपोर्ट India's 7th Biodiversity Report (NR7) कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी (CBD) को सौंपी है। इस रिपोर्ट में 2030 तक तय किए गए लक्ष्यों की दिशा में देश की प्रगति का एक वास्तविक आकलन किया गया है।
यह रिपोर्ट केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि काफी महत्वपूर्ण है। खास बात यह है कि 2022 में कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (KMGBF) लागू होने के बाद यह पहली व्यापक समीक्षा है। रिपोर्ट में जहां एक ओर बाघ जैसे प्रमुख जीवों की संख्या में सुधार और जंगलों के विस्तार जैसी सकारात्मक बातें सामने आई हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ चिंताएं भी जताई गई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 23 राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्यों में से केवल 2 लक्ष्य ही फिलहाल सही दिशा में आगे बढ़ते दिख रहे हैं। ऐसे में, दशक के बीच में खड़े होकर एक बड़ा सवाल सामने आता है कि क्या भारत नीतियों को जमीन पर सही तरीके से लागू कर पाएगा, या फिर 2030 के लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो जाएगा।
भारत की 7वीं जैव विविधता रिपोर्ट यह समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर देती है कि देश 2030 के लक्ष्यों की दिशा में कितना आगे बढ़ा है। यह रिपोर्ट न केवल प्रगति को दर्शाती है, बल्कि उन चुनौतियों को भी सामने लाती है जो भविष्य में रास्ता कठिन बना सकती हैं।
कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (KMGBF) Kunming-Montreal Global Biodiversity Framework (KMGBF) को अक्सर “प्रकृति के लिए पेरिस समझौता” कहा जाता है। यह 2030 तक पूरे करने के लिए 23 वैश्विक लक्ष्यों को निर्धारित करता है। इन लक्ष्यों में पृथ्वी के 30% भूमि और समुद्री क्षेत्रों की सुरक्षा, प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करना और खराब हो चुके पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्स्थापित करना शामिल है।
भारत ने इस वैश्विक लक्ष्य के प्रति तेजी और व्यवस्थित तरीके से प्रतिक्रिया दी है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने अपनी राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (NBSAP) National Biodiversity Strategy and Action Plan (NBSAP), को अपडेट किया है। इससे यह सुनिश्चित किया गया है कि भारत की नीतियां वैश्विक लक्ष्यों के अनुरूप हों।
7वीं राष्ट्रीय रिपोर्ट (NR7) तैयार करना एक बड़ा और जटिल काम था। इसके लिए कई स्तरों पर समन्वय किया गया।
33 केंद्रीय मंत्रालयों की भागीदारी: कृषि से लेकर वित्त तक सभी विभागों ने मिलकर काम किया ताकि सभी की नीतियां एक दिशा में हों।
तकनीकी सहयोग: राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) United Nations Development Programme (UNDP) ने इस प्रक्रिया में मदद की।
डेटा की सटीकता: वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) Wildlife Institute of India (WII) ने वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराई, जिससे विभिन्न प्रजातियों से जुड़े लक्ष्यों की निगरानी की जा सके।
इसके अलावा, 142 राष्ट्रीय संकेतकों को ट्रैक करने के लिए एक डिजिटल NR7 पोर्टल भी बनाया गया। यह “डेटा आधारित संरक्षण” की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, रिपोर्ट यह भी मानती है कि डेटा की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे किस तरीके से एकत्र किया गया है।
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राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्य 1 (NBT1) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विकास कार्यों में जैव विविधता को नजरअंदाज न किया जाए। इसके तहत ऐसी योजनाएं बनाने पर जोर दिया गया है जिनमें प्रकृति का संतुलन बना रहे।
रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में भारत “स्थिर प्रगति” कर रहा है।
भारत में वन और पेड़ों का कुल क्षेत्रफल अब 8,27,357 वर्ग किलोमीटर हो गया है, जो देश के कुल क्षेत्रफल का 25.17% है। 2021 से 2023 के बीच इसमें 1,445.81 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
हालांकि यह आंकड़े सकारात्मक दिखते हैं, लेकिन इसके पीछे कुछ जटिलताएं भी हैं। इस वृद्धि का बड़ा हिस्सा “फॉरेस्ट के बाहर पेड़” (TOF) और वृक्षारोपण से आया है, न कि पुराने प्राकृतिक जंगलों के विस्तार से।
इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम भी उठाए गए हैं:
वेटलैंड की सूची तैयार करना: देशभर में वेटलैंड का रिकॉर्ड बनाया गया है, ताकि इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों को बचाया जा सके।
PARIVESH 2.0 प्लेटफॉर्म: यह एक डिजिटल सिस्टम है जो पर्यावरण से जुड़ी मंजूरियों को आसान बनाता है और साथ ही पर्यावरण सुरक्षा का ध्यान रखता है।
ईको-सेंसिटिव जोन (ESZ): अधिकतर संरक्षित क्षेत्रों के आसपास बफर जोन बनाए गए हैं, जिससे इंसान और वन्यजीवों के बीच टकराव कम हो सके और अतिक्रमण रोका जा सके।
रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 24.1 मिलियन हेक्टेयर भूमि को पहले ही बहाल किया जा चुका है या उस पर काम चल रहा है। कागज पर देखा जाए तो भारत अपने लक्ष्य के काफी करीब नजर आता है।
लेकिन दूसरी तरफ, डेजर्टिफिकेशन और लैंड डिग्रेडेशन एटलस एक अलग तस्वीर दिखाता है। इसके अनुसार, भारत की लगभग 29.77% भूमि यानी करीब 97 मिलियन हेक्टेयर अभी भी खराब हो रही है।
मुख्य आंकड़े इस प्रकार हैं:
वन कार्बन स्टॉक: 7,285.5 मिलियन टन, जिसमें 81.5 मिलियन टन की वृद्धि हुई है।
बांस क्षेत्र में वृद्धि: 1,540 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी हुई है।
मैंग्रोव कवर: थोड़ी वृद्धि दर्ज की गई है।
भूमि क्षरण: कुल क्षेत्रफल का 29.77% हिस्सा प्रभावित है।
इस स्थिति को “बहाली का विरोधाभास” कहा जा सकता है। इसका मतलब है कि एक तरफ भूमि को सुधारा जा रहा है, लेकिन दूसरी तरफ उतनी ही तेजी से नई भूमि खराब भी हो रही है। इसके पीछे असंतुलित खेती, जलवायु परिवर्तन और औद्योगीकरण जैसे कारण हैं।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि अलग-अलग तरीकों से डेटा मापा जाता है, जिससे यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वास्तव में भूमि की स्थिति में सुधार हो रहा है या नहीं।
KMGBF का तीसरा लक्ष्य “30x30” के नाम से जाना जाता है। इसका मतलब है कि 2030 तक दुनिया की 30% भूमि और समुद्री क्षेत्रों को संरक्षित किया जाए।
भारत जैसे अधिक जनसंख्या वाले देश के लिए यह एक बहुत बड़ी चुनौती है।
इस समय भारत में राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य जैसे संरक्षित क्षेत्र कुल भूमि का सिर्फ 5% से थोड़ा ज्यादा हिस्सा कवर करते हैं।
इस अंतर को पूरा करने के लिए भारत “अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपाय” (OECMs) पर जोर दे रहा है।
OECMs में ऐसे क्षेत्र शामिल होते हैं जो औपचारिक रूप से पार्क नहीं हैं, लेकिन वहां लंबे समय तक जैव विविधता की रक्षा की जाती है। जैसे:
पवित्र वन (Sacred Groves)।
समुदाय द्वारा प्रबंधित जंगल।
कुछ औद्योगिक हरित क्षेत्र।
रिपोर्ट के अनुसार, समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (MPAs) में भी बढ़ोतरी हो रही है। लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि भारत 2030 तक 30% का लक्ष्य हासिल कर पाएगा या नहीं।
इन क्षेत्रों को बढ़ाने के लिए स्थानीय और आदिवासी समुदायों का सहयोग बहुत जरूरी है, क्योंकि उनकी आजीविका इन्हीं संसाधनों पर निर्भर करती है।
अगर जैव विविधता संरक्षण को सम्मान दिया जाए, तो भारत की कुछ प्रमुख प्रजातियां इसमें सबसे आगे होंगी। NBT4 का फोकस प्रजातियों की संख्या बढ़ाने और उन्हें बचाने पर है, और इस मामले में भारत ने अच्छी प्रगति की है।
बाघ (Tigers): इनकी संख्या बढ़कर 3,167 हो गई है, जो प्रोजेक्ट टाइगर की सफलता को दर्शाता है।
एशियाई शेर (Asiatic Lions): ये केवल गिर क्षेत्र में पाए जाते हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।
एक सींग वाला गैंडा (One-Horned Rhinoceros): असम के काजीरंगा जैसे क्षेत्रों में इनकी संख्या स्थिर और बढ़ती हुई है।
हालांकि, यह सफलता मुख्य रूप से कुछ बड़ी और प्रसिद्ध प्रजातियों तक ही सीमित है।
जैव विविधता केवल बड़े जानवरों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें छोटे जीव, फंगस, कीड़े और पौधे भी शामिल हैं।
रिपोर्ट में यह माना गया है कि इन कम ज्ञात प्रजातियों के बारे में पर्याप्त डेटा उपलब्ध नहीं है। इसलिए पूरी जैव विविधता की सही स्थिति का आकलन करना अभी भी मुश्किल बना हुआ है।
भारत में भूमि उपयोग में बदलाव का सबसे बड़ा कारण कृषि है। इसलिए खेती के क्षेत्रों में जैव विविधता को शामिल करना लंबे समय तक खाद्य सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है।
रिपोर्ट के अनुसार, एग्रोफॉरेस्ट्री अब भारत के लगभग 8.65% क्षेत्र में फैल चुकी है। इसका मतलब है कि खेती के साथ पेड़ लगाए जा रहे हैं, जिससे अलग-अलग जंगलों के बीच जीवों के आने-जाने के लिए रास्ते बन रहे हैं।
लेकिन रिपोर्ट में एक बड़ी कमी भी सामने आती है, जो है पोषक तत्वों का बहाव और कीटनाशकों का उपयोग।
रिपोर्ट में पेड़ों की संख्या पर तो ध्यान दिया गया है, लेकिन खेती में इस्तेमाल होने वाले रसायनों को कम करने पर पर्याप्त डेटा नहीं दिया गया है।
खेतों से निकलने वाले नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे रसायन जल स्रोतों में पहुंचकर प्रदूषण फैलाते हैं। इससे पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जिसे यूट्रोफिकेशन कहा जाता है, और इससे जल जीवों को नुकसान होता है।
सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की बात कर रही है, लेकिन इसका जैव विविधता पर कितना असर पड़ा है, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
7वीं राष्ट्रीय रिपोर्ट केवल उपलब्धियों की सूची नहीं है, बल्कि यह भी बताती है कि जैव विविधता को मापना कितना मुश्किल काम है। इस क्षेत्र में कई बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं।
जैव विविधता से जुड़ा डेटा अलग-अलग मंत्रालयों में बिखरा हुआ है।
कृषि मंत्रालय Ministry of Agriculture मिट्टी से जुड़ा डेटा रखता है।
जल शक्ति मंत्रालय Ministry of Jal Shakti पानी से जुड़ी जानकारी रखता है।
पर्यावरण मंत्रालय जंगलों और पेड़ों पर नजर रखता है।
इन सभी को जोड़कर एक राष्ट्रीय जैव विविधता निगरानी प्रणाली बनाना अभी भी जारी है।
रिपोर्ट में शामिल 142 संकेतकों में से कई नए हैं। इनके लिए अभी तक कोई एक समान तरीका तय नहीं किया गया है।
जैसे कि फसलों के जंगली रिश्तेदारों की आनुवंशिक विविधता को कैसे मापा जाए या आक्रामक प्रजातियों का स्थानीय लोगों पर क्या असर है, इन सबके लिए स्पष्ट नियम नहीं हैं।
जलवायु परिवर्तन एक बड़ा खतरा बनकर सामने आ रहा है।
तापमान बढ़ने और बारिश के पैटर्न बदलने से जीव-जंतुओं के रहने के स्थान तेजी से बदल रहे हैं।
इसके अलावा, जंगलों में आग की घटनाएं भी बढ़ रही हैं, जो कुछ ही समय में वर्षों की मेहनत को नष्ट कर सकती हैं।
भारत की 7वीं राष्ट्रीय रिपोर्ट एक संतुलित तस्वीर पेश करती है। इसमें नीतियां मजबूत हैं, संस्थागत ढांचा तैयार है और कुछ क्षेत्रों में अच्छे परिणाम भी दिख रहे हैं।
लेकिन फिलहाल केवल दो लक्ष्य, NBT1 (योजना) और NBT2 (बहाली), ही सही दिशा में आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं।
बाकी 21 लक्ष्यों के लिए रिपोर्ट में ठोस आंकड़ों के बजाय केवल चल रही योजनाओं का जिक्र किया गया है।
2030 के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भारत को कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे।
वित्तीय संसाधनों में वृद्धि: संरक्षण के लिए अधिक निवेश की जरूरत है।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी: लोगों को शामिल किए बिना संरक्षण सफल नहीं हो सकता।
डेटा में सुधार: केवल बड़े जानवरों पर नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर ध्यान देना जरूरी है।
भारत ने प्रगति जरूर की है, लेकिन अब नीतियों को जमीन पर लागू करने की गति बढ़ानी होगी। आने वाले कुछ साल तय करेंगे कि भारत अपने पर्यावरणीय लक्ष्यों को हासिल कर पाता है या नहीं।
भारत की 7वीं जैव विविधता रिपोर्ट प्रगति और चुनौतियों दोनों को सामने लाती है। देश ने जंगलों के विस्तार, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और कुछ प्रजातियों के संरक्षण में अच्छी प्रगति की है, लेकिन 2030 तक सभी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अभी भी काफी काम बाकी है।
रिपोर्ट बताती है कि मजबूत नीतियां और संस्थागत व्यवस्था मौजूद हैं, लेकिन उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उन्हें कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है।
आने वाले साल बहुत महत्वपूर्ण होंगे। संरक्षण क्षेत्रों का विस्तार, भूमि क्षरण को रोकना, डेटा सिस्टम को बेहतर बनाना और शासन व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी होगा।
इसके साथ ही, विकास योजनाओं में जैव विविधता को शामिल करना भी बहुत जरूरी है, ताकि लंबे समय तक पर्यावरण संतुलित बना रहे।
भारत जैसे जैव विविधता से भरपूर देश के लिए यह एक बड़ी जिम्मेदारी है। 2030 के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सरकार के साथ-साथ समाज, उद्योग और आम लोगों की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी होगी। इससे एक सुरक्षित और संतुलित पर्यावरण का भविष्य सुनिश्चित किया जा सकता है।