भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था लंबे समय से एक बड़ी चुनौती का सामना कर रही है, जिसमें लोगों को इलाज के लिए अपनी जेब से काफी खर्च करना पड़ता है। खासकर दवाइयों पर होने वाला खर्च घरों के कुल स्वास्थ्य खर्च का बड़ा हिस्सा होता है। सरकारी और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े अनुमान बताते हैं कि भारत में कई परिवारों के कुल चिकित्सा खर्च का लगभग 50 से 60 प्रतिशत हिस्सा केवल दवाइयों पर ही खर्च होता है।
यह आर्थिक बोझ विशेष रूप से कम आय वाले परिवारों, ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए ज्यादा गंभीर होता है। इसलिए जरूरी है कि लोगों को आवश्यक दवाइयाँ सस्ती कीमत पर उपलब्ध हों। इससे स्वास्थ्य सेवाओं में समानता बढ़ती है और परिवारों को आर्थिक सुरक्षा भी मिलती है।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए सरकार ने प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) Pradhan Mantri Bhartiya Janaushadhi Pariyojana (PMBJP) की शुरुआत की। इस योजना का उद्देश्य लोगों को गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाइयाँ कम कीमत पर उपलब्ध कराना है। इसके लिए देशभर में जनऔषधि केंद्र (Jan Aushadhi Kendras) खोले गए हैं, जहां ब्रांडेड दवाइयों के बराबर प्रभाव वाली जेनेरिक दवाइयाँ काफी कम कीमत पर मिलती हैं।
इन केंद्रों पर मिलने वाली दवाइयाँ ब्रांडेड दवाओं जितनी ही प्रभावी होती हैं, लेकिन उनकी कीमत काफी कम होती है। इससे मरीजों को इलाज पर होने वाले खर्च में बड़ी राहत मिलती है और वे बिना आर्थिक दबाव के उपचार करवा सकते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में इस योजना का तेजी से विस्तार हुआ है और अब यह भारत की सबसे प्रभावशाली किफायती स्वास्थ्य योजनाओं में से एक बन चुकी है। मजबूत आपूर्ति व्यवस्था, सख्त गुणवत्ता मानक, डिजिटल तकनीक और उद्यमिता को बढ़ावा देने जैसी पहल के जरिए यह योजना देश के दूर-दराज़ इलाकों तक भी सस्ती दवाइयाँ पहुंचाने का काम कर रही है। यह सरकार की उस सोच को भी दर्शाती है जिसमें स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ, किफायती और सभी के लिए समान बनाने पर जोर दिया गया है।
जनऔषधि सप्ताह 2026 के अवसर पर इस योजना की उपलब्धियां और भी स्पष्ट रूप से सामने आई हैं। यह सप्ताह 7 मार्च को मनाए जाने वाले आठवें जनऔषधि दिवस के साथ संपन्न हुआ। इस वर्ष कार्यक्रम की थीम “जनऔषधि सस्ती भी, भरोसेमंद भी, सेहत की बात, बचत के साथ” रही। इस अभियान ने यह साबित किया है कि अच्छी गुणवत्ता वाली दवाइयाँ भी कम कीमत पर उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
आज देशभर में 18,000 से अधिक जनऔषधि केंद्र संचालित हो रहे हैं और सरकार का लक्ष्य 2027 तक इनकी संख्या 25,000 तक पहुंचाने का है। प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना केवल एक दवा वितरण योजना नहीं है, बल्कि यह देश के 1.4 अरब से अधिक लोगों के लिए स्वास्थ्य सुरक्षा और आर्थिक बचत सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा अभियान बन चुकी है।
यह लेख इस योजना की संरचना, इसके आर्थिक प्रभाव और देशभर में समावेशी उद्यमिता को बढ़ावा देने में इसकी भूमिका का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
सस्ती दवाइयों तक पहुंच किसी भी देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। भारत जैसे विकासशील देशों में लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अक्सर अपनी जेब से काफी खर्च करना पड़ता है। कई परिवारों के लिए इलाज का खर्च सीधे उनकी आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है।
जब दवाइयाँ महंगी होती हैं, तो कई मरीज समय पर इलाज शुरू नहीं कर पाते। कुछ लोग दवाइयों की खुराक कम कर देते हैं या बीच में ही दवा लेना बंद कर देते हैं। इससे बीमारी और अधिक गंभीर हो सकती है और मरीज की सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है।
दवाइयों के महंगे होने का एक बड़ा कारण ब्रांडेड दवाइयों का अधिक उपयोग है। आमतौर पर ब्रांडेड दवाइयाँ बिना ब्रांड वाली जेनेरिक दवाइयों की तुलना में काफी महंगी होती हैं। जबकि दोनों में एक ही सक्रिय दवा तत्व होता है और दोनों का इलाज में प्रभाव लगभग समान होता है। ब्रांडेड दवाइयों की कीमत अक्सर उनके प्रचार, मार्केटिंग और ब्रांडिंग के कारण बढ़ जाती है।
इसी समस्या को समझते हुए भारत सरकार ने प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) शुरू की। इस योजना का उद्देश्य लोगों को कम कीमत पर गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाइयाँ उपलब्ध कराना है। देशभर में जनऔषधि केंद्रों के माध्यम से दवाइयाँ उपलब्ध कराकर इस योजना ने लाखों लोगों को सस्ती दरों पर आवश्यक दवाइयाँ प्राप्त करने में मदद की है।
प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) Pradhan Mantri Bhartiya Janaushadhi Pariyojana (PMBJP) भारत सरकार की एक प्रमुख योजना है। इसका उद्देश्य लोगों को सस्ती कीमत पर अच्छी गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाइयाँ उपलब्ध कराना है। यह दवाइयाँ विशेष खुदरा दुकानों के माध्यम से दी जाती हैं जिन्हें जनऔषधि केंद्र (Jan Aushadhi Kendras – JAKs) कहा जाता है।
इस योजना को फार्मास्यूटिकल्स एंड मेडिकल डिवाइसेस ब्यूरो ऑफ इंडिया (PMBI) Pharmaceuticals and Medical Devices Bureau of India (PMBI) लागू करता है, जो रसायन और उर्वरक मंत्रालय के अंतर्गत फार्मास्यूटिकल्स विभाग Department of Pharmaceuticals के तहत काम करता है। इस योजना का मुख्य लक्ष्य जेनेरिक दवाइयों के उपयोग को बढ़ावा देना और लोगों को कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण दवाइयाँ उपलब्ध कराना है।
इस योजना के तहत सरकार दवाइयों की खरीद, गुणवत्ता जांच और वितरण की व्यवस्था करती है। वहीं, निजी उद्यमी, फार्मासिस्ट और विभिन्न संगठन जनऔषधि केंद्रों का संचालन करते हैं। यह सरकार और निजी क्षेत्र की साझेदारी वाला मॉडल है, जिससे इस योजना का विस्तार तेजी से पूरे देश में हो पाया है।
आज के समय में पीएमबीजेपी दुनिया की सबसे बड़ी सस्ती जेनेरिक दवा योजनाओं में से एक बन चुकी है। यह योजना भारत में सभी लोगों को सुलभ और किफायती स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने के लक्ष्य को मजबूत करती है।
पीएमबीजेपी की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार दवाइयों की गुणवत्ता और सुरक्षा है। इस योजना में दवाइयों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कड़े मानकों का पालन किया जाता है, ताकि लोगों का भरोसा बना रहे।
इस योजना के तहत मिलने वाली सभी दवाइयाँ केवल उन कंपनियों से खरीदी जाती हैं जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस (WHO-GMP) World Health Organization Good Manufacturing Practices (WHO-GMP) मानकों का पालन करती हैं। ये मानक यह सुनिश्चित करते हैं कि दवाइयाँ अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुसार तैयार की जाएं।
इसके अलावा दवाइयों के हर बैच की जांच नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लेबोरेट्रीज (NABL) National Accreditation Board for Testing and Calibration Laboratories (NABL) से मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में की जाती है। इन जांचों में दवाइयों की प्रभावशीलता, शुद्धता, स्थिरता और सुरक्षा की जांच की जाती है।
जब दवाइयाँ सभी निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरी उतरती हैं, तभी उन्हें जनऔषधि केंद्रों तक भेजा जाता है। इस बहु-स्तरीय गुणवत्ता जांच प्रणाली से यह सुनिश्चित होता है कि लोगों को सुरक्षित और प्रभावी दवाइयाँ सस्ती कीमत पर मिलें।
पीएमबीजेपी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक देशभर में जनऔषधि केंद्रों का तेजी से विस्तार है।
इस समय पूरे भारत में 18,000 से अधिक जनऔषधि केंद्र संचालित हो रहे हैं। इन केंद्रों पर कई तरह की दवाइयाँ और चिकित्सा से जुड़ी वस्तुएँ सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराई जाती हैं।
सरकार ने इस योजना के तहत मार्च 2027 तक 25,000 जनऔषधि केंद्र खोलने का लक्ष्य रखा है। इससे देश के और अधिक लोगों तक सस्ती दवाइयाँ पहुँच सकेंगी।
ये केंद्र शहरों, कस्बों, गांवों और दूरदराज़ क्षेत्रों में स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि हर क्षेत्र के लोगों को इसका लाभ मिल सके। कई जनऔषधि केंद्र सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में भी खोले गए हैं। इससे मरीज डॉक्टर से परामर्श लेने के तुरंत बाद वहीं से सस्ती दवाइयाँ खरीद सकते हैं।
हर दिन लगभग 10 से 12 लाख लोग जनऔषधि केंद्रों से दवाइयाँ खरीदते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह योजना भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
समय के साथ प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) के तहत उपलब्ध दवाइयों और चिकित्सा उत्पादों की संख्या लगातार बढ़ाई गई है, ताकि लोगों की अलग-अलग स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा किया जा सके।
वर्तमान में इस योजना के अंतर्गत 2,110 प्रकार की दवाइयाँ और 315 सर्जिकल उत्पाद उपलब्ध हैं। ये दवाइयाँ और उत्पाद 29 अलग-अलग उपचार श्रेणियों को कवर करते हैं। इनमें कई प्रमुख बीमारियों के इलाज से जुड़ी दवाइयाँ शामिल हैं, जैसे:
संक्रमण से संबंधित दवाइयाँ (Anti-infective medicines)
मधुमेह यानी डायबिटीज की दवाइयाँ (Anti-diabetic drugs)
हृदय रोग से संबंधित दवाइयाँ (Cardiovascular medicines)
कैंसर के इलाज की दवाइयाँ (Anti-cancer treatments)
पेट और पाचन तंत्र से जुड़ी दवाइयाँ (Gastrointestinal medicines)
दर्द प्रबंधन से जुड़ी दवाइयाँ (Pain management drugs)
दवाइयों के अलावा इस योजना के तहत मेडिकल उपकरण, सर्जिकल उपयोग की सामग्री और जांच से जुड़े उपकरण भी उपलब्ध कराए जाते हैं।
उत्पादों की यह विस्तृत श्रृंखला यह सुनिश्चित करती है कि तीव्र (acute) और दीर्घकालिक (chronic) दोनों प्रकार की बीमारियों से पीड़ित मरीज जनऔषधि केंद्रों के माध्यम से सस्ती दरों पर इलाज प्राप्त कर सकें।
प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जनऔषधि केंद्रों पर मिलने वाली दवाइयों की कीमत बाजार में मिलने वाली ब्रांडेड दवाइयों की तुलना में काफी कम होती है।
आमतौर पर जनऔषधि केंद्रों पर उपलब्ध दवाइयों की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) बाजार में मिलने वाली समान ब्रांडेड दवाइयों से लगभग 50 से 80 प्रतिशत तक कम होती है।
दवाइयों की इस कम कीमत ने देश के लाखों परिवारों के स्वास्थ्य खर्च को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
जून 2025 तक जनऔषधि नेटवर्क के माध्यम से लगभग ₹7,700 करोड़ की MRP मूल्य की दवाइयाँ बेची जा चुकी थीं। इससे नागरिकों को ब्रांडेड दवाइयों की तुलना में लगभग ₹38,000 करोड़ की बचत होने का अनुमान है।
विशेष रूप से डायबिटीज, उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) और हृदय रोग जैसी दीर्घकालिक बीमारियों से जूझ रहे परिवारों के लिए यह बचत लंबे समय में इलाज की लागत को काफी कम कर देती है।
जनऔषधि केंद्रों के नेटवर्क को तेजी से बढ़ाने के लिए सरकार ने फ्रेंचाइज़ी आधारित मॉडल अपनाया है। इस मॉडल के तहत निजी व्यक्तियों और संगठनों को भी जनऔषधि केंद्र खोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
उद्यमी, गैर-सरकारी संगठन (NGOs), ट्रस्ट, सोसायटी और निजी संस्थाएँ PMBI की आधिकारिक वेबसाइट official PMBI portal के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन करके जनऔषधि केंद्र खोल सकते हैं।
इस व्यवस्था से सरकार पर पूरे संचालन का भार नहीं पड़ता और केंद्रों का विस्तार तेजी से देश के अलग-अलग क्षेत्रों में हो पाता है।
फ्रेंचाइज़ी प्रणाली का एक और फायदा यह है कि जनऔषधि केंद्र ग्रामीण क्षेत्रों, ब्लॉकों, तहसीलों और दूर-दराज़ के इलाकों में भी स्थापित किए जा सकते हैं, जहाँ सस्ती दवाइयों की उपलब्धता पहले सीमित थी।
सरकार की निगरानी और निजी भागीदारी के इस मॉडल से एक स्थायी और प्रभावी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था विकसित हो रही है, जो लोगों तक सस्ती दवाइयाँ पहुँचाने में मदद करती है।
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जो व्यक्ति प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्र खोलना चाहते हैं, उनके पास डी. फार्मा (D. Pharma) या बी. फार्मा (B. Pharma) की डिग्री होना आवश्यक है।
यदि आवेदक के पास यह योग्यता नहीं है, तो उसे एक योग्य फार्मासिस्ट को नियुक्त करना होगा जिसके पास डी. फार्मा या बी. फार्मा की डिग्री हो। इसका प्रमाण आवेदन के समय या अंतिम स्वीकृति से पहले देना होगा।
उद्यमी, फार्मासिस्ट, ट्रस्ट, सोसायटी, गैर-सरकारी संगठन (NGO) और चैरिटेबल संस्थाएं भी जन औषधि केंद्र खोलने के लिए आवेदन कर सकती हैं।
लेकिन इन संस्थाओं को एक योग्य बी. फार्मा या डी. फार्मा डिग्रीधारी फार्मासिस्ट को नियुक्त करना होगा और आवेदन के समय उसका प्रमाण देना होगा।
यदि जन औषधि केंद्र सरकारी अस्पताल के परिसर में स्थापित किया जाता है, तो आमतौर पर प्रतिष्ठित एनजीओ और चैरिटेबल संस्थाओं को प्राथमिकता दी जाती है।
हालांकि, इस स्थान के लिए व्यक्तिगत आवेदक भी आवेदन कर सकते हैं।
जन औषधि केंद्र चलाने वाली एजेंसी को बेची गई प्रत्येक दवा के अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) पर 20% मार्जिन दिया जाता है। यह मार्जिन कर (टैक्स) को छोड़कर दिया जाता है।
कुछ विशेष श्रेणियों के लिए अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। इसमें शामिल हैं:
महिला उद्यमी
दिव्यांगजन
अनुसूचित जाति (SC)
अनुसूचित जनजाति (ST)
पूर्व सैनिक
पिछड़े जिले
हिमालयी क्षेत्र
द्वीप क्षेत्र
उत्तर-पूर्वी राज्य
इन श्रेणियों के पात्र आवेदकों को एक बार के लिए ₹2 लाख तक की आर्थिक सहायता दी जाती है। इसमें शामिल है:
₹1.50 लाख फर्नीचर और दुकान के उपकरणों के लिए।
₹0.50 लाख कंप्यूटर, प्रिंटर, इंटरनेट और अन्य तकनीकी सुविधाओं के लिए।
यह सहायता “एक परिवार – एक अनुदान” नियम के अंतर्गत केवल एक बार दी जाती है।
इस योजना के अंतर्गत “रिश्तेदार” शब्द में आवेदक का जीवनसाथी, अविवाहित आश्रित भाई-बहन तथा सीधे पूर्वज या वंशज शामिल होते हैं।
जन औषधि केंद्र खोलने के लिए आवेदक के पास कम से कम 120 वर्ग फुट स्थान होना चाहिए। यह स्थान स्वयं का या किराए पर लिया हुआ हो सकता है।
यदि स्थान किराए पर है, तो लीज एग्रीमेंट या स्थान आवंटन पत्र प्रस्तुत करना होगा।
फार्मास्यूटिकल्स एंड मेडिकल डिवाइसेस ब्यूरो ऑफ इंडिया (PMBI) स्थान उपलब्ध कराने में सहायता नहीं करता है।
आवेदक को एक पंजीकृत फार्मासिस्ट की व्यवस्था करनी होगी, जिसका पंजीकरण संबंधित राज्य फार्मेसी परिषद में होना चाहिए।
इसका प्रमाण आवेदन के समय या अंतिम स्वीकृति से पहले देना आवश्यक है।
यदि आवेदक महिला उद्यमी, पूर्व सैनिक, दिव्यांग, SC, ST, आकांक्षी जिले, हिमालयी क्षेत्र, द्वीप क्षेत्र या उत्तर-पूर्वी राज्यों की श्रेणी में आवेदन करता है, तो उसे इसका वैध प्रमाण पत्र देना होगा।
एक बार चयन होने के बाद श्रेणी में परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
सामान्य रूप से एक जिले में दो जन औषधि केंद्रों के बीच कम से कम 1 किलोमीटर की दूरी होनी चाहिए।
हालांकि, यह नियम उन केंद्रों पर लागू नहीं होता जो:
जिला सरकारी अस्पताल से 500 मीटर के भीतर हों।
100 से अधिक बेड वाले निजी अस्पतालों के पास हों।
मेडिकल कॉलेज से जुड़े हों।
अंतिम स्वीकृति से पहले PMBI बाजार सर्वेक्षण के आधार पर स्थान की व्यवहार्यता का मूल्यांकन करता है।
आवेदकों को दवाओं की आपूर्ति के भुगतान के लिए भारतीय राष्ट्रीयकृत बैंक से तीन चेक PMBI के नाम से जमा करने होंगे।
इसके अलावा एक रद्द (Cancelled) चेक भी जमा करना आवश्यक है।
आवेदन पत्र जमा करते समय आवेदक को ₹5,000 का गैर-वापसी योग्य आवेदन शुल्क देना होगा।
कुछ श्रेणियों के आवेदकों को आवेदन शुल्क में छूट दी जाती है, जैसे:
महिला उद्यमी
दिव्यांगजन
अनुसूचित जाति (SC)
अनुसूचित जनजाति (ST)
पूर्व सैनिक
आकांक्षी जिले, हिमालयी क्षेत्र, द्वीप क्षेत्र और उत्तर-पूर्वी राज्यों के उद्यमी
इन श्रेणियों के आवेदकों को शुल्क छूट के लिए वैध प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना होगा।
प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना न केवल सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देती है, बल्कि समावेशी उद्यमिता को भी प्रोत्साहित करती है।
जनऔषधि केंद्र चलाने वाले उद्यमियों को सरकार की ओर से कई प्रकार के वित्तीय प्रोत्साहन दिए जाते हैं। केंद्र संचालकों को दवाइयों की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) पर 20 प्रतिशत तक का व्यापारिक मार्जिन मिलता है, जिसमें कर शामिल नहीं होते।
इसके अलावा यदि केंद्र निर्धारित नियमों के अनुसार दवाइयों का स्टॉक बनाए रखते हैं और सही तरीके से संचालन करते हैं, तो उन्हें प्रदर्शन के आधार पर ₹5 लाख तक की अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि भी मिल सकती है।
सरकार कुछ विशेष वर्गों को जनऔषधि केंद्र खोलने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन भी देती है, जिनमें शामिल हैं:
महिला उद्यमी
अनुसूचित जाति (SC) के उद्यमी
अनुसूचित जनजाति (ST) के उद्यमी
दिव्यांगजन
आकांक्षी जिलों और दूरदराज़ क्षेत्रों में केंद्र खोलने वाले उद्यमी
इन पात्र उद्यमियों को ₹2 लाख तक का विशेष प्रोत्साहन दिया जा सकता है। इसमें फर्नीचर, उपकरण, कंप्यूटर और अन्य आवश्यक बुनियादी सुविधाओं के लिए खर्च की भरपाई भी शामिल होती है।
इस प्रकार की नीतियाँ एक ओर जहां लोगों तक सस्ती दवाइयाँ पहुंचाने में मदद करती हैं, वहीं दूसरी ओर रोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण को भी बढ़ावा देती हैं।
पीएमबीजेपी के अंतर्गत सबसे प्रभावशाली पहलों में से एक जनऔषधि सुविधा सेनेटरी नैपकिन कार्यक्रम Janaushadhi Suvidha sanitary napkin programme है, जिसे वर्ष 2019 में शुरू किया गया था।
इस पहल का उद्देश्य महिलाओं के स्वास्थ्य और मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ावा देना है। इसके तहत सेनेटरी पैड बेहद सस्ती कीमत पर उपलब्ध कराए जाते हैं। एक पैड की कीमत केवल ₹1 रखी गई है, ताकि अधिक से अधिक महिलाएं इसका उपयोग कर सकें।
इन सेनेटरी नैपकिन को ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल तकनीक से बनाया गया है। इसका मतलब है कि उपयोग के बाद ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर यह सामग्री धीरे-धीरे नष्ट हो जाती है। इससे पर्यावरण को भी कम नुकसान होता है और कचरा प्रबंधन में मदद मिलती है।
31 जनवरी 2026 तक पूरे भारत में 100 करोड़ से अधिक सुविधा सेनेटरी पैड बेचे जा चुके थे। वित्त वर्ष 2025–26 में ही जनवरी 2026 तक 22.50 करोड़ से अधिक पैड की बिक्री हुई।
यह पहल महिलाओं के स्वास्थ्य के साथ-साथ लैंगिक समानता को भी बढ़ावा देती है, क्योंकि इससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को सुरक्षित मासिक धर्म स्वच्छता उत्पाद सस्ती कीमत पर उपलब्ध हो पाते हैं।
पारदर्शिता और सुविधा बढ़ाने के लिए सरकार ने वर्ष 2019 में जन औषधि सुगम मोबाइल ऐप Jan Aushadhi Sugam mobile application शुरू किया।
यह ऐप एक डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में काम करता है, जिससे नागरिक अपने नजदीकी जन औषधि केंद्र की जानकारी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।
इस ऐप की मुख्य सुविधाएँ निम्नलिखित हैं:
जियो-लोकेशन सेवा के माध्यम से गूगल मैप्स की मदद से नजदीकी केंद्र का पता लगाना।
दवाओं की खोज सुविधा, जिससे यह पता चलता है कि कौन-सी दवा उपलब्ध है।
मूल्य तुलना सुविधा, जिससे उपयोगकर्ता जेनेरिक और ब्रांडेड दवाओं के बीच कीमत का अंतर देख सकते हैं।
यह ऐप एंड्रॉयड और iOS दोनों प्लेटफॉर्म पर मुफ्त उपलब्ध है।
डिजिटल तकनीक के उपयोग से यह ऐप लोगों को सस्ती जेनेरिक दवाओं के बारे में जानकारी देता है और उन्हें सही निर्णय लेने में मदद करता है।
भारत जैसे बड़े देश में स्वास्थ्य सेवाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाना बहुत महत्वपूर्ण है।
इसी उद्देश्य से सरकार ने कई कदम उठाए हैं:
राज्य सरकारों को सरकारी अस्पतालों में किराया-मुक्त स्थान देने के लिए प्रोत्साहित किया गया है ताकि वहाँ जन औषधि केंद्र खोले जा सकें।
दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम स्टॉक रखने का नियम बनाया गया है।
उत्पादों की सूची को बढ़ाकर इसमें न्यूट्रास्यूटिकल्स और स्वास्थ्य सप्लीमेंट्स भी शामिल किए जा रहे हैं।
इन कदमों से यह सुनिश्चित होता है कि जन औषधि केंद्र लगातार दवाएं उपलब्ध कराते रहें और स्थानीय लोगों की जरूरतों को पूरा कर सकें।
यात्रियों और प्रवासी मजदूरों तक सस्ती दवाएं पहुंचाने के लिए पीएमबीजेपी ने परिवहन केंद्रों पर भी अपनी सेवाओं का विस्तार किया है।
31 जनवरी 2026 तक देश भर के रेलवे स्टेशनों पर 116 जन औषधि केंद्र स्थापित किए जा चुके थे।
ये केंद्र यात्रियों को सस्ती कीमत पर आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराते हैं, खासकर उन लोगों को जो कम आय वर्ग से आते हैं।
रेलवे स्टेशन जैसे भीड़भाड़ वाले स्थानों पर स्थित होने के कारण लोग यात्रा के दौरान भी आसानी से जरूरी दवाएं खरीद सकते हैं।
जन औषधि केंद्रों में दवाओं की नियमित उपलब्धता बनाए रखने के लिए मजबूत आपूर्ति व्यवस्था बहुत जरूरी है।
इसके लिए फार्मास्यूटिकल्स एंड मेडिकल डिवाइसेस ब्यूरो ऑफ इंडिया (PMBI) ने आईटी आधारित सप्लाई चेन प्रबंधन प्रणाली विकसित की है।
वर्तमान में यह प्रणाली 5 केंद्रीय गोदामों और 41 वितरकों के माध्यम से पूरे देश में काम कर रही है।
संस्था लगभग 400 तेजी से बिकने वाली दवाओं की नियमित निगरानी करती है और मांग का अनुमान लगाकर आपूर्ति सुनिश्चित करती है।
सितंबर 2024 से केंद्रों को 200 अधिक मांग वाली दवाएं रखने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसमें फार्मास्यूटिकल बाजार की 100 सबसे अधिक बिकने वाली और 100 सबसे तेजी से बिकने वाली दवाएं शामिल हैं।
डिजिटल प्रणाली और डेटा के आधार पर की जाने वाली योजना से दवाओं की खरीद और वितरण की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और स्थिर बन रही है।
जेनेरिक दवाओं के उपयोग को बढ़ाने में जनजागरूकता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए सरकार समय-समय पर लोगों को जागरूक करने के लिए विशेष अभियान चलाती है।
इसी उद्देश्य से हर वर्ष जनऔषधि सप्ताह आयोजित किया जाता है, जिसका समापन 7 मार्च को जनऔषधि दिवस के रूप में किया जाता है।
जनऔषधि सप्ताह 2026 के दौरान पूरे भारत में 250 से अधिक स्थानों पर स्वास्थ्य शिविर और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों में लोगों के लिए मुफ्त स्वास्थ्य जांच, डायग्नोस्टिक सेवाएँ और सस्ती दवाओं के बारे में जानकारी दी गई।
इस अभियान का मुख्य संदेश था —
“जनऔषधि सस्ती भी, भरोसेमंद भी, सेहत की बात, बचत के साथ।”
यह संदेश बताता है कि जन औषधि की दवाएँ केवल सस्ती ही नहीं, बल्कि विश्वसनीय और प्रभावी भी हैं।
प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी पहल के रूप में उभरी है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य लोगों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाएँ उपलब्ध कराना है।
देश भर में फैले जन औषधि केंद्रों के माध्यम से मरीजों को ब्रांडेड दवाओं की तुलना में बहुत कम कीमत पर जेनेरिक दवाएँ मिल रही हैं। इससे लाखों परिवारों के स्वास्थ्य खर्च में काफी कमी आई है।
यह योजना केवल सस्ती दवाएँ उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। इसके अंतर्गत सख्त गुणवत्ता जांच प्रणाली लागू की गई है, जिससे दवाओं की विश्वसनीयता बनी रहती है। साथ ही जन औषधि सुगम मोबाइल ऐप जैसी डिजिटल सेवाएँ लोगों को नजदीकी केंद्र और दवाओं की जानकारी आसानी से उपलब्ध कराती हैं।
इसके अलावा, योजना के तहत दिए जाने वाले प्रोत्साहन से विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोगों को उद्यमिता के अवसर भी मिल रहे हैं। इससे रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं और योजना का विस्तार भी तेजी से हो रहा है।
जनऔषधि सुविधा सेनेटरी नैपकिन कार्यक्रम और देशभर में चलाए जा रहे जागरूकता अभियान इस योजना की जन-कल्याण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
जैसे-जैसे भारत अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत कर रहा है, वैसे-वैसे पीएमबीजेपी सभी नागरिकों को सस्ती, सुलभ और समान स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने के लक्ष्य को पूरा करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
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Pradhan Mantri Bhartiya Janaushadhi Pariyojana and Its Impact on Affordable Healthcare