हेल्थकेयर इंडस्ट्री का मुख्य उद्देश्य लोगों की जान बचाना, सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाना और आपात स्थितियों में मदद करना है। लेकिन अस्पतालों, दवा बनाने वाली कंपनियों, मेडिकल सप्लाई चेन और आधुनिक हेल्थ टेक्नोलॉजी के पीछे एक बड़ा पर्यावरणीय संकट भी छिपा हुआ है, जिस पर अक्सर कम ध्यान दिया जाता है।
आज दुनिया भर में हेल्थकेयर सेक्टर जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन, ज्यादा बिजली खपत करने वाले अस्पताल, मेडिकल वेस्ट, ट्रांसपोर्ट सिस्टम और जटिल सप्लाई चेन पर्यावरण पर गंभीर असर डाल रहे हैं।
दुनिया भर की सरकारें और कंपनियाँ 'नेट ज़ीरो' और 'सतत विकास लक्ष्यों' को हासिल करने की दिशा में काम कर रही हैं। नतीजतन, स्वास्थ्य सेवा संस्थानों पर भी अपने कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने का दबाव बढ़ता जा रहा है। हालाँकि, मरीज़ों की देखभाल से समझौता किए बिना ऐसा करना कोई आसान काम नहीं है।
बढ़ती मरीज संख्या, बुजुर्ग आबादी, हेल्थकेयर कर्मचारियों की कमी, तेजी से बढ़ती डिजिटल टेक्नोलॉजी और आर्थिक दबाव के कारण Sustainability Goals को हासिल करना और मुश्किल होता जा रहा है।
केपीएमजी 2025 हेल्थकेयर सीईओ आउटलुक KPMG 2025 Healthcare CEO Outlook रिपोर्ट के अनुसार, कई हेल्थकेयर लीडर्स जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरों और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों को समझते हैं, लेकिन इन लक्ष्यों को जमीन पर लागू करने में अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं।
अस्पतालों में ज्यादा ऊर्जा खपत, कार्बन उत्सर्जन वाली सप्लाई चेन, मेडिकल कचरा और नई तकनीकों को अपनाने जैसी समस्याओं के कारण हेल्थकेयर सेक्टर को ऑपरेशनल एफिशिएंसी और लॉन्ग-टर्म सस्टेनेबिलिटी के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।
दूसरी तरफ, जलवायु परिवर्तन खुद भी मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। हीटवेव, प्रदूषण, महामारी और प्राकृतिक आपदाओं के कारण स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में हेल्थकेयर इंडस्ट्री अब इस समस्या का हिस्सा भी है और समाधान का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी।
दुनियाभर के हेल्थकेयर सिस्टम हर दिन भारी मात्रा में ऊर्जा और संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं। अस्पताल 24 घंटे चलते हैं, जहां लाइटिंग, हीटिंग, कूलिंग, लाइफ सपोर्ट सिस्टम, सर्जरी उपकरण, लैब और डेटा सेंटर के लिए लगातार बिजली की जरूरत होती है। यही कारण है कि हेल्थकेयर सेक्टर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बड़ा योगदान दे रहा है।
वैश्विक पर्यावरणीय अध्ययनों के अनुसार, हेल्थकेयर इंडस्ट्री दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग 4.5% से 5% हिस्सा पैदा करती है। अगर हेल्थकेयर सेक्टर को एक देश माना जाए, तो यह दुनिया के सबसे बड़े प्रदूषण फैलाने वाले देशों में शामिल होगा।
अमेरिका, चीन, यूनाइटेड किंगडम और यूरोप जैसे देशों में आधुनिक हेल्थकेयर सिस्टम और बड़े स्तर पर दवा निर्माण के कारण कार्बन उत्सर्जन और अधिक है।
अस्पताल दुनिया की सबसे ज्यादा ऊर्जा खपत करने वाली इमारतों में शामिल हैं। ICU, ऑपरेशन थिएटर, MRI और CT स्कैन जैसी मशीनें, साथ ही दवाइयों के लिए कोल्ड स्टोरेज सिस्टम लगातार बिजली पर निर्भर रहते हैं। कई देशों में अस्पताल अभी भी कोयला, गैस और अन्य जीवाश्म ईंधन से बनने वाली बिजली का उपयोग करते हैं, जिससे प्रदूषण और बढ़ता है।
हेल्थकेयर सेक्टर केवल अस्पतालों के जरिए ही नहीं, बल्कि सप्लाई चेन, ट्रांसपोर्ट सिस्टम, दवा निर्माण और मेडिकल वेस्ट के जरिए भी जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करता है। इसे हेल्थकेयर का “Scope 3 Emissions” कहा जाता है, जो इस सेक्टर के कुल कार्बन फुटप्रिंट का सबसे बड़ा हिस्सा माना जाता है।
आज कई हेल्थकेयर संस्थाएं Sustainability Targets और Net Zero Goals की घोषणा कर रही हैं। लेकिन इन लक्ष्यों को वास्तविकता में बदलना अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
केपीएमजी 2025 हेल्थकेयर सीईओ आउटलुक KPMG 2025 Healthcare CEO Outlook रिपोर्ट के अनुसार, केवल 30% हेल्थकेयर लीडर्स ही अपने बड़े निवेश फैसलों में Sustainability Costs और Return on Investment को सही तरीके से शामिल करते हैं। इसके अलावा, सिर्फ 12% हेल्थकेयर CEOs को भरोसा है कि उनकी संस्थाएं 2030 तक Net Zero Goals हासिल कर पाएंगी।
यह आंकड़े दिखाते हैं कि जलवायु लक्ष्यों और वास्तविक कामकाजी चुनौतियों के बीच अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है।
हेल्थकेयर लीडर्स को एक साथ कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जैसेः
केपीएमजी इंटरनेशनल की हेल्थकेयर की ग्लोबल हेड बेकी फेंटन Global Head of Healthcare Beccy Fenton के अनुसार, “बढ़ती वर्कफोर्स की कमी, बढ़ती डिमांड, बढ़ा हुआ बजट और साइबर अटैक और अगली महामारी की चिंताएं सीईओ के दिमाग में बड़ी होनी चाहिए।” “growing workforce shortages, rising demand, stretched budgets and concerns about cyber-attacks and the next pandemic should loom large on CEOs' minds."
दूसरे उद्योगों की तुलना में हेल्थकेयर सेक्टर के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करना ज्यादा मुश्किल है। अस्पतालों को आपात स्थिति, हीटवेव, महामारी और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी लगातार काम करना पड़ता है। इसलिए इस सेक्टर में Sustainability Transition धीमा और अधिक जटिल माना जाता है।
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हेल्थकेयर सेक्टर से होने वाले कार्बन उत्सर्जन का एक बड़ा कारण मेडिकल सप्लाई चेन है।
हेल्थकेयर सप्लाई चेन में कई चीजें शामिल होती हैं, जैसेः
ये सप्लाई चेन बहुत जटिल, अंतरराष्ट्रीय और संसाधनों पर निर्भर होती हैं।
COVID-19 महामारी के दौरान यह साफ हो गया कि दुनियाभर के हेल्थकेयर सिस्टम वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क पर कितने ज्यादा निर्भर हैं। PPE किट, सिरिंज, वेंटिलेटर और टेस्टिंग किट के बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण प्लास्टिक वेस्ट और ट्रांसपोर्ट से होने वाला प्रदूषण तेजी से बढ़ा।
KPMG के अनुसार, हेल्थकेयर कंपनियों के लिए सप्लाई चेन को मजबूत बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। लेकिन इन सप्लाई चेन को Carbon-Free बनाना आसान नहीं है, क्योंकि इसमें सुरक्षा मानक, सरकारी नियम और लगातार मेडिकल सप्लाई बनाए रखने की जरूरत शामिल होती है।
मेडिकल सप्लाई चेन में Sustainability से ज्यादा साफ-सफाई, तेजी और भरोसेमंद सेवाओं को प्राथमिकता दी जाती है। इसी कारण अस्पतालों में एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक उत्पाद (Single-Use Plastic Products) का इस्तेमाल बहुत ज्यादा होता है। हालांकि, इससे संक्रमण का खतरा कम होता है, लेकिन भारी मात्रा में कचरा भी पैदा होता है।
इनमें शामिल हैंः
इनमें से कई उत्पाद इस्तेमाल के बाद जलाए जाते हैं, जिससे वातावरण में हानिकारक गैसें फैलती हैं।
दवा निर्माण उद्योग भी हेल्थकेयर सेक्टर के प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन में बड़ी भूमिका निभाता है।
दवाइयों के निर्माण में कई संसाधनों की जरूरत होती है, जैसेः
फार्मास्युटिकल फैक्ट्रियों से निकलने वाले गंदे पानी में अक्सर केमिकल और एंटीबायोटिक अवशेष पाए जाते हैं। अगर इनका सही तरीके से निपटान न हो, तो यह नदियों, भूजल और पर्यावरण को प्रदूषित कर सकते हैं।
रिसर्च में यह भी सामने आया है कि दवा उद्योग से होने वाला प्रदूषण Antimicrobial Resistance (AMR) को बढ़ावा दे रहा है। AMR दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य खतरों में से एक बनता जा रहा है। जब एंटीबायोटिक अवशेष पानी में पहुंचते हैं, तो बैक्टीरिया उन दवाइयों के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं। इससे जीवन बचाने वाली दवाइयों का असर कम हो सकता है।
इनहेलर के निर्माण से भी कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है। कई अस्थमा इनहेलर में Hydrofluorocarbon Propellants का इस्तेमाल होता है, जो बेहद शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस मानी जाती हैं। इसी वजह से कई देश अब कम कार्बन उत्सर्जन वाले इनहेलर विकल्पों को बढ़ावा दे रहे हैं।
हेल्थकेयर सेक्टर हर साल बहुत बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करता है। इसमें से काफी कचरा खतरनाक होता है या फिर उसे दोबारा रिसाइकिल नहीं किया जा सकता।
मेडिकल वेस्ट में कई तरह की चीजें शामिल होती हैं, जैसेः
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) World Health Organization (WHO), के अनुसार, COVID-19 महामारी के दौरान मेडिकल वेस्ट में भारी बढ़ोतरी हुई थी। अरबों डिस्पोजेबल मास्क, ग्लव्स, टेस्ट किट और वैक्सीन सिरिंज ने पहले से दबाव झेल रहे वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम को और कमजोर कर दिया।
अगर मेडिकल कचरे का सही तरीके से निपटान न किया जाए, तो यह पर्यावरण में जहरीले प्रदूषक फैला सकता है। अस्पतालों में संक्रमण रोकने के लिए अक्सर मेडिकल कचरे को जलाया जाता है, लेकिन इससे कार्बन उत्सर्जन और खतरनाक वायु प्रदूषण बढ़ता है।
प्लास्टिक वेस्ट भी एक बड़ी समस्या बन चुका है। अस्पतालों में साफ-सफाई और सुरक्षा कारणों से डिस्पोजेबल प्लास्टिक का इस्तेमाल बहुत ज्यादा किया जाता है। लेकिन मेडिकल प्लास्टिक को रिसाइकिल करना आसान नहीं होता, क्योंकि उसमें संक्रमण का खतरा बना रहता है।
अब कई हेल्थकेयर संस्थान पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए Reusable Medical Products, Sustainable Procurement Systems और Waste Segregation Technologies पर काम कर रहे हैं।
अस्पताल सामान्य व्यावसायिक इमारतों की तुलना में कहीं ज्यादा ऊर्जा का उपयोग करते हैं।
अस्पतालों में ऊर्जा खपत बढ़ाने वाले मुख्य कारण हैंः
जलवायु परिवर्तन खुद भी अस्पतालों की ऊर्जा जरूरतों को बढ़ा रहा है। बढ़ते तापमान और हीटवेव के कारण अस्पतालों को ज्यादा कूलिंग सिस्टम इस्तेमाल करने पड़ रहे हैं।
दूसरी तरफ, बाढ़, तूफान और बिजली कटौती जैसी प्राकृतिक आपदाएं अस्पतालों के इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बड़ा खतरा बन रही हैं। इससे जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।
इसी वजह से कई अस्पताल अब नई तकनीकों में निवेश कर रहे हैं, जैसेः
हालांकि, इन नई सुविधाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित करने के लिए भारी निवेश की जरूरत होती है, जिसे कई हेल्थकेयर सिस्टम आसानी से वहन नहीं कर पाते।
आज के दौर में, टेक्नोलॉजी आधुनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों का एक अभिन्न अंग बन गई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ रिकॉर्ड, टेलीमेडिसिन और स्मार्ट हॉस्पिटल सिस्टम, मरीज़ों की देखभाल के तरीके को तेज़ी से बदल रहे हैं।
KPMG के अनुसार, 87% हेल्थकेयर संस्थाएं अपने बजट का 10% से ज्यादा हिस्सा AI Solutions पर खर्च करने की योजना बना रही हैं। वहीं, 83% संस्थाओं को उम्मीद है कि उन्हें तीन साल के भीतर इसका फायदा मिलना शुरू हो जाएगा।
डिजिटल हेल्थकेयर Sustainability को कई तरीकों से बेहतर बना सकता है, जैसेः
उदाहरण के तौर पर, Telemedicine के जरिए मरीज घर बैठे डॉक्टर से सलाह ले सकते हैं। इससे यात्रा कम होती है और ट्रांसपोर्ट से होने वाला कार्बन उत्सर्जन भी घटता है।
हालांकि, डिजिटल बदलाव अपने साथ नई पर्यावरणीय चुनौतियां भी लेकर आ रहा है।
AI सिस्टम और हेल्थकेयर डेटा सेंटर को चलाने के लिए बहुत ज्यादा बिजली और कंप्यूटिंग पावर की जरूरत होती है। Cloud Computing, बड़े डेटा स्टोरेज सिस्टम और एडवांस मेडिकल टेक्नोलॉजी ऊर्जा की मांग को काफी बढ़ा रहे हैं।
KPMG के डॉ. जाज धालीवाल Dr Jaz Dhaliwal of KPMG ने कहा, “इसमें कोई शक नहीं है कि डिजिटलाइजेशन केयर डिलीवरी मॉडल के भविष्य को आकार देने में एक अहम कैटलिस्ट का काम करेगा।” “There is no question that digitalisation will serve as a pivotal catalyst in shaping the future of care delivery models."
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 55% हेल्थकेयर लीडर्स Data Readiness को AI लागू करने में सबसे बड़ी बाधा मानते हैं।
अगर डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को Sustainable तरीके से विकसित नहीं किया गया, तो हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी का विस्तार अनजाने में कार्बन उत्सर्जन को और बढ़ा सकता है।
विडंबना यह है कि जलवायु परिवर्तन खुद दुनियाभर के हेल्थकेयर सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा रहा है।
बढ़ती गर्मी, प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाओं के कारण कई बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जैसेः
केवल वायु प्रदूषण ही हर साल लाखों लोगों की समय से पहले मौत का कारण बन रहा है।
हीटवेव के दौरान अस्पतालों में इमरजेंसी मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है। वहीं, जंगलों में आग, बाढ़ और तूफान जैसी घटनाएं अस्पतालों के इंफ्रास्ट्रक्चर और सप्लाई चेन को प्रभावित कर रही हैं।
इस तरह हेल्थकेयर सिस्टम एक खतरनाक चक्र में फंस गया है।
एक तरफ जलवायु परिवर्तन स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ हेल्थकेयर सेक्टर की गतिविधियां खुद कार्बन उत्सर्जन बढ़ाने में योगदान दे रही हैं।
हेल्थकेयर सेक्टर में Sustainability हासिल करने की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक फंडिंग है।
कई अस्पताल और हेल्थकेयर संस्थान पहले से ही आर्थिक दबाव में काम कर रहे हैं। खासकर सरकारी हेल्थकेयर सिस्टम बढ़ती इलाज लागत और बुजुर्ग आबादी के कारण बजट संकट का सामना कर रहे हैं।
इसी वजह से हेल्थकेयर प्रबंधन को कई जरूरी चीजों को प्राथमिकता देनी पड़ती है, जैसेः
ऐसे में लंबे समय के पर्यावरणीय निवेश तुरंत मरीजों की जरूरतों की तुलना में कम जरूरी दिखाई देते हैं।
KPMG के अनुसार, कई हेल्थकेयर संस्थाएं फिलहाल जलवायु पहलों की बजाय Short-Term Operational Survival पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं।
इसी कारण Sustainability Goals तो सार्वजनिक रूप से घोषित किए जाते हैं, लेकिन उन्हें जमीन पर लागू करने की रफ्तार काफी धीमी बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हेल्थकेयर लीडर्स को Sustainability को केवल Corporate Responsibility का हिस्सा नहीं, बल्कि अपनी मुख्य कार्य रणनीति का हिस्सा बनाना होगा।
Sustainable Healthcare Leadership में कई महत्वपूर्ण कदम शामिल हैं, जैसेः
इसके साथ ही हेल्थकेयर सिस्टम को सरकारों, टेक्नोलॉजी कंपनियों और पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करना होगा।
KPMG के अनुसार, हेल्थकेयर संस्थानों को बेहतर Sustainability और मजबूत सिस्टम तैयार करने के लिए पूरे हेल्थकेयर इकोसिस्टम में मजबूत साझेदारी विकसित करनी चाहिए।
भविष्य में हेल्थकेयर Sustainability काफी हद तक Innovation, सरकारी नियमों और लोगों के व्यवहार में बदलाव पर निर्भर करेगी।
आने वाले समय में हेल्थकेयर सेक्टर में कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं, जैसेः
दुनियाभर की सरकारें अब राष्ट्रीय जलवायु नीतियों में हेल्थकेयर सेक्टर के कार्बन उत्सर्जन को भी शामिल करने लगी हैं।
आने वाले वर्षों में Sustainability केवल एक विकल्प नहीं रहेगी, बल्कि यह प्रतिस्पर्धा और सरकारी नियमों का जरूरी हिस्सा बन सकती है।
जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में हेल्थकेयर इंडस्ट्री एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। हेल्थकेयर सिस्टम का उद्देश्य लोगों की जान बचाना और स्वास्थ्य की रक्षा करना है, लेकिन इसका बढ़ता पर्यावरणीय प्रभाव खुद जलवायु संकट को और गंभीर बना रहा है।
ऊर्जा की ज्यादा खपत करने वाले अस्पताल, दवा निर्माण, भारी मेडिकल वेस्ट, जटिल सप्लाई चेन और तेजी से बढ़ता डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर हेल्थकेयर सेक्टर के सामने बड़ी Sustainability चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं।
KPMG 2025 Healthcare CEO Outlook रिपोर्ट बताती है कि जलवायु लक्ष्यों और वास्तविक कार्यान्वयन के बीच बड़ा अंतर मौजूद है। आर्थिक दबाव, कर्मचारियों की कमी, बढ़ती परिचालन चुनौतियां और कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर Net Zero Goals की दिशा में प्रगति को धीमा कर रहे हैं।
हालांकि, अब इस समस्या को नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण बीमारियां, हीटवेव, प्रदूषण और स्वास्थ्य आपात स्थितियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में हेल्थकेयर सेक्टर के लिए Sustainable Transformation अब विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है।
भविष्य का हेल्थकेयर केवल नई मेडिकल टेक्नोलॉजी पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि यह सेक्टर कार्बन उत्सर्जन को कितना कम कर पाता है, मजबूत सिस्टम बना पाता है और मरीजों की देखभाल के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारियों का संतुलन कैसे बनाए रखता है।
वैश्विक सहयोग, लंबे समय के निवेश, तकनीकी नवाचार और मजबूत Sustainable Leadership के जरिए ही हेल्थकेयर इंडस्ट्री लोगों की जान बचाने के अपने उद्देश्य को पृथ्वी की सुरक्षा के साथ जोड़ पाएगी।