दशहरा, जिसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई और अन्याय पर धर्म की जीत का प्रतीक है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, दशहरे का संबंध दो प्रमुख घटनाओं से है। पहली, भगवान श्रीराम द्वारा दस सिरों वाले राक्षस राजा रावण का वध और दूसरी, देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर नामक राक्षस का अंत।
इन दोनों पौराणिक कथाओं से हमें सत्य, साहस, न्याय और बुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है। दशहरा हिंदू पंचांग के प्रमुख त्योहारों में शामिल है। यह आमतौर पर नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्रि पर्व के समापन का प्रतीक भी है। नवरात्रि के दौरान देवी दुर्गा और उनकी दिव्य शक्ति के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है।
दशहरे का त्योहार The Festival of Dussehra लोगों के जीवन में खुशियां, भक्ति और नई उम्मीद लेकर आता है। इस अवसर पर परिवार और समुदाय के लोग एक साथ मिलकर पूजा-पाठ, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और पारंपरिक उत्सवों में हिस्सा लेते हैं। यह पर्व लोगों को अपने कार्यों पर विचार करने, आस्था को मजबूत बनाने और ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर भी देता है। साथ ही, यह हमें शांति, सद्भाव और अच्छे मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
वर्ष 2026 में भारत के अधिकांश हिस्सों में विजयादशमी मंगलवार, 20 अक्टूबर को मनाई जाएगी। हालांकि, पश्चिम बंगाल और ओडिशा सहित पूर्वी भारत के कुछ राज्यों में स्थानीय परंपराओं और पंचांग के अनुसार उत्सव की तिथियों में अंतर हो सकता है। इन क्षेत्रों में बिजोया दशमी बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 को मनाई जा सकती है।
दशहरा की शुभकामनाएं Happy Dussehra
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को देश विजयादशमी Vijayadashmi मनाएगा। छल पर सत्य की विजय के प्रतीक के रूप में यह पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को प्रतिवर्ष मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं (Mythology) के अनुसार, भगवान राम ने इसी दिन लंका के राजा और शक्तिशाली बुद्धिमान रावण को युद्ध में मारने के बाद रावण का वध किया था। इसके अलावा मां दुर्गा ने इसी दिन महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था।
इसी वजह से हर साल विजयादशमी के उपलक्ष्य में रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं। पंडालों में की जाने वाली मां दुर्गा की पूजा Worship Of Maa Durga दशहरे के दिन संपन्न होती है। आइए जानते हैं दशहरे का महत्व और पूजा का शुभ मुहूर्त।
रावण के माता सीता का अपहरण करने के बाद रावण और प्रभु श्रीराम (Lord Shri Ram) के बीच यह युद्ध दस दिनों तक चलता रहा। अंत में, अश्विन शुक्ल दशमी पर, भगवान राम ने माता दुर्गा से प्राप्त दिव्यास्त्र की सहायता से अभिमानी रावण को हरा दिया। रावण के निधन को धोखे के खिलाफ न्याय और सच्चाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। चूंकि भगवान राम ने इस दिन रावण को हराया था, इसलिए इसे विजयादशमी के रूप में जाना जाता है।
इसी दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध भी किया था। महिषासुर एक ऐसा राक्षस था जिसने तीनों लोकों में अशांति फैला दी थी। यहां तक कि जब इस राक्षस ने देवताओं को परेशान किया। आश्विन शुक्ल दशमी (Ashwin Shukla Dashami) के दिन देवी ने महिषासुर का वध कर देवताओं और समस्त विश्व को उसके शासन से मुक्त कर दिया। तभी से इस दिन को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। देवताओं ने विजया देवी की पूजा की क्योंकि वे देवी की जीत से खुश थे। इस दिन इसके अलावा शस्त्रों की भी पूजा की जाती है। भारतीय सेना (Indian Army) भी इस दिन शस्त्रों की पूजा करती है।
- विजय मुहूर्त (Vijay Muhurat): 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 1:59 बजे से 2:45 बजे तक रहेगा। स्थान के अनुसार इस समय में थोड़ा अंतर हो सकता है। कुछ पंचांगों में यह समय दोपहर 2:00 बजे से 2:46 बजे तक बताया गया है।
- अपराह्न पूजा मुहूर्त (Aparahna Puja Muhurat): पूजा के लिए शुभ समय दोपहर 1:14 बजे से 3:30 बजे तक रहेगा।
- दशमी तिथि की शुरुआत (Dashami Tithi Begins): दशमी तिथि 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12:50 बजे शुरू होगी।
- दशमी तिथि की समाप्ति (Dashami Tithi Ends): दशमी तिथि 21 अक्टूबर 2026 को दोपहर 2:11 बजे समाप्त होगी।
दशहरा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। इसके बाद गेहूं या फिर चूने से दशहरा की प्रतिमा बनाएं। इसके बाद गाय के गोबर से नौ गोले (कंडे) बना लें। इन कंडों पर पर जौ और दही लगाएं। इस दिन बहुत से लोग भगवान राम की झांकियों पर जौ चढ़ाते हैं और कई जगह लड़के अपने कान पर जौ रखते हैं।
इसके बाद गोबर से दो कटोरियां बना लें। एक कटोरी में कुछ सिक्के भर दें और दूसरी में रोली, चावल, फल, फूल, और जौ (Roli, Rice, Fruits, Flowers, and Barley) डाल दें। बनाई हुई प्रतिमा पर केले, मूली, ग्वारफली, गुड़ और चावल (Bananas, Radish, Guarflies, Jaggery and Rice) चढ़ाएं।
इसके बाद उसके समक्ष धूप-दीप (Incense-lamp) इत्यादि प्रज्वलित करें। इस दिन लोग अपने बहीखाता (Ledger account) की भी पूजा करते हैं। ऐसे में आप अपने बहीखाते पर भी जौ, रोली इत्यादि चढ़ाएं। ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को भोजन कराएं और सामर्थ्य अनुसार उन्हें दान दें। रावण दहन के बाद घर के बड़े लोगों का आशीर्वाद लें।
विजयदशमी, जिसे दशहरा भी कहा जाता है, पर शस्त्र पूजन की परंपरा बहुत पुरानी और महत्वपूर्ण है। इसके पीछे कई मान्यताएं प्रचलित हैं। एक प्रमुख कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीराम ने रावण का वध करने के लिए युद्ध पर जाने का निर्णय लिया, तो उन्होंने अपने शस्त्रों की पूजा की थी। इसी प्रकार, एक अन्य मान्यता के अनुसार, जब मां दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया था, तब उनके शस्त्रों का पूजन देवताओं द्वारा किया गया था।
यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है, जब राजा-महाराजा भी युद्ध पर जाने से पहले अपने शस्त्रों की पूजा किया करते थे। शस्त्र पूजन का उद्देश्य केवल विजय की कामना नहीं, बल्कि शस्त्रों के प्रति सम्मान और उनके उचित उपयोग की भावना को जागृत करना था। इस दिन शस्त्रों की पूजा कर के, शक्ति और साहस का आह्वान किया जाता है।
उत्तर भारत (North India) में, दशहरा बहुत धूमधाम से मनाया जाता है और राम लीला (Ramlila) ,भगवान राम की कहानी का एक अधिनियम, नवरात्रि के सभी नौ दिनों में आयोजित किया जाता है, जिसमें रावण की हत्या और दशहरा या विजयदशमी के दिन उसके आदमकद पुतले को जलाने के साथ समाप्त होता है।
मेघनाद और कुंभकरण के साथ। दशहरा पापों या बुरे गुणों से छुटकारा पाने का भी प्रतीक है क्योंकि रावण का प्रत्येक सिर एक बुरे गुण का प्रतीक है।
दशहरा कई तरह से दिवाली (Diwali) की तैयारी शुरू करता है, जो विजयदशमी के 20 दिन बाद मनाया जाता है, जिस दिन भगवान राम सीता के साथ अयोध्या पहुंचे थे। विजयादशमी के दिन शमी के पेड़ की पूजा करना देश के कुछ हिस्सों में बहुत महत्व रखता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि अर्जुन ने अपने वनवास के दौरान शमी के पेड़ के अंदर अपने हथियार छुपाए थे।
भारत (India) के कुछ दक्षिणी राज्यों (Southern States) में शमी पूजा को बन्नी पूजा और जम्मी पूजा Bunny Pooja and Jammi Pooja के नाम से भी जाना जाता है। दशमी के दिन, भक्त भी माँ दुर्गा को विदा करते हैं और विसर्जन या तो अपर्णा के समय या प्रात:काल के दौरान किया जाता है।
दसवें दिन को विजयदशमी के रूप में भी जाना जाता है जब मां दुर्गा की मूर्ति को पानी में विसर्जित किया जाता है और भक्तों को उम्मीद है कि वह सभी बुराइयों और दुखों को दूर करते हुए उन पर नजर रखेगी। दशहरा और विजयदशमी दोनों बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक हैं और भक्त परिवार और दोस्तों के साथ विभिन्न व्यंजनों का आनंद उठाकर त्योहार का आनंद लेते हैं।
दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इसका संबंध रामायण की प्रसिद्ध कथा से है। यह त्योहार भगवान श्रीराम की रावण पर विजय की याद में मनाया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है। रावण ने भगवान राम की पत्नी माता सीता का अपहरण कर लिया था। रावण को अहंकार, घमंड, लालच और अज्ञान जैसी बुराइयों का प्रतीक माना जाता है।
माता सीता को रावण के चंगुल से मुक्त कराने के लिए भगवान श्रीराम ने अपने भाई लक्ष्मण, हनुमान जी और वानर सेना की सहायता से लंका पर चढ़ाई की थी। लंबे युद्ध के बाद दशमी के दिन भगवान राम ने रावण का वध किया। इसी विजय की खुशी में हर साल दशहरा मनाया जाता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सत्य, साहस और धर्म के रास्ते पर चलने वाले व्यक्ति की अंततः जीत होती है।
रावण के दस सिरों को अक्सर मनुष्य के अंदर मौजूद दस बुराइयों का प्रतीक माना जाता है। इनमें अहंकार, काम, क्रोध, मोह, लोभ, ईर्ष्या, घमंड, आसक्ति, स्वार्थ और अन्याय जैसी बुराइयां शामिल हैं। भगवान राम के हाथों रावण की हार केवल एक पौराणिक घटना नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि मनुष्य को अपनी बुरी आदतों और नकारात्मक विचारों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।
दशहरे पर रावण के पुतले जलाने की परंपरा इसी संदेश को याद दिलाती है। यह परंपरा हमें प्रेरित करती है कि हम अपने अंदर की बुराइयों को दूर करें और धर्म, सत्य तथा अच्छे आचरण का रास्ता अपनाएं। दशहरा हमें यह भी सिखाता है कि ज्ञान और शक्ति होने के बावजूद यदि व्यक्ति में अहंकार आ जाए, तो उसका पतन निश्चित हो सकता है।
भारत के अधिकांश हिस्सों में दशहरा भगवान राम की रावण पर विजय के रूप में मनाया जाता है। हालांकि, देश के कुछ क्षेत्रों में इस त्योहार का संबंध देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय से भी है। खासकर पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व है। यह पर्व विजयादशमी के दिन देवी दुर्गा की महिषासुर पर जीत के साथ संपन्न होता है। यह बुराई पर अच्छाई और अन्याय पर न्याय की विजय का प्रतीक है।
दुर्गा पूजा के दौरान भव्य पंडाल बनाए जाते हैं। इनमें देवी दुर्गा की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। लोग पूजा-अर्चना करते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं और परिवार तथा दोस्तों के साथ त्योहार मनाते हैं। विजयादशमी के दिन कई स्थानों पर देवी दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है।
दशहरा और दुर्गा पूजा की अलग-अलग परंपराएं भारत की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं। दोनों ही पर्व यह संदेश देते हैं कि बुराई चाहे किसी भी रूप में हो, अंत में अच्छाई और सत्य की जीत होती है।
दशहरा पूरे भारत में उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। हालांकि, अलग-अलग राज्यों में इसे मनाने के तरीके और परंपराएं अलग हैं। कहीं भगवान राम की विजय का उत्सव मनाया जाता है, तो कहीं देवी दुर्गा की महिषासुर पर जीत को याद किया जाता है। इन सभी परंपराओं का मुख्य संदेश बुराई पर अच्छाई की जीत है।
इस दिन लोग मंदिरों में पूजा करते हैं, धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं और अपने परिवार के साथ त्योहार की खुशियां बांटते हैं। कई शहरों और कस्बों में मेले, नाटक, शोभायात्राएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
दशहरे से पहले रामलीला का आयोजन भारत की सबसे प्रसिद्ध धार्मिक परंपराओं में से एक है। रामलीला में कलाकार रामायण की घटनाओं को नाटक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसमें भगवान राम के जन्म, माता सीता के स्वयंवर, वनवास, सीता हरण और रावण के साथ युद्ध जैसी प्रमुख घटनाओं को दिखाया जाता है।
रामलीला का आयोजन आमतौर पर खुले मैदानों, पार्कों और सार्वजनिक स्थानों पर किया जाता है। इसमें कलाकार भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान और रावण जैसे पात्रों की भूमिका निभाते हैं। रंगीन वेशभूषा, संवाद, संगीत और मंच सजावट के कारण दर्शकों को रामायण की कहानी करीब से देखने का अवसर मिलता है।
दशहरे के दिन कई स्थानों पर रामलीला का समापन रावण वध के दृश्य के साथ होता है। यह आयोजन लोगों को भगवान राम के आदर्शों, कर्तव्य, सत्य और धर्म का महत्व समझाने में मदद करता है।
दशहरे की सबसे लोकप्रिय परंपराओं में रावण, उसके पुत्र मेघनाद और उसके भाई कुंभकर्ण के पुतलों का दहन शामिल है। इन पुतलों को अक्सर बांस, कागज और अन्य सामग्री से बनाया जाता है। कई जगहों पर ये पुतले काफी ऊंचे होते हैं और इन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं।
उत्तर भारत में यह परंपरा विशेष रूप से लोकप्रिय है। दिल्ली, वाराणसी और अन्य शहरों में दशहरे के अवसर पर बड़े आयोजन किए जाते हैं। रावण के पुतले को जलाने के साथ आतिशबाजी और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं। लोग इस दृश्य को देखकर भगवान राम की विजय का उत्सव मनाते हैं।
पुतलों का दहन बुराई, अहंकार और अन्याय के अंत का प्रतीक है। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि जीवन में गलत कामों से दूर रहना चाहिए और हमेशा सत्य तथा अच्छे आचरण का साथ देना चाहिए।
कर्नाटक के मैसूर शहर में दशहरा बेहद भव्य तरीके से मनाया जाता है। यहां इसे मैसूर दशहरा के नाम से जाना जाता है। इस अवसर पर पूरे शहर को रोशनी से सजाया जाता है और कई सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। दशहरे की शोभायात्रा इस उत्सव का मुख्य आकर्षण होती है। इसमें सजे हुए हाथियों और पारंपरिक झांकियों के साथ देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा को विशेष रूप से सजाए गए स्वर्ण आसन पर ले जाया जाता है। यह उत्सव मैसूर की ऐतिहासिक और शाही परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
दूसरी ओर, पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में विजयादशमी दुर्गा पूजा के समापन का महत्वपूर्ण दिन होता है। दुर्गा पूजा के दौरान शहर में आकर्षक पंडाल बनाए जाते हैं और देवी दुर्गा की सुंदर प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। लोग पूजा-पाठ, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सामुदायिक आयोजनों में भाग लेते हैं। विजयादशमी के दिन कई स्थानों पर देवी दुर्गा की प्रतिमाओं का जल में विसर्जन किया जाता है। यह परंपरा देवी के अपने दिव्य धाम लौटने का प्रतीक मानी जाती है।
मैसूर का दशहरा और कोलकाता की दुर्गा पूजा भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं। इन त्योहारों को मनाने के तरीके भले ही अलग हों, लेकिन इनका मूल संदेश समान है। ये पर्व हमें सत्य, धर्म, साहस और अच्छाई के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
अधर्म पर धर्म की जीत
अन्याय पर न्याय की विजय
बुरे पर अच्छे की जय जयकार
यही है दशहरा का त्योहार।
दशहरा की शुभकामनाएं Happy Dussehra