ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 BRICS Summit 2026 भारत के लिए एक महत्वपूर्ण वैश्विक आर्थिक और कूटनीतिक आयोजन है। भारत चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा।
यह शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर 2026 को भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित किया जाएगा। इसमें विस्तारित ब्रिक्स समूह के सदस्य देशों के नेता शामिल होंगे। यह बैठक ऐसे समय हो रही है, जब दुनिया की अर्थव्यवस्था भू-राजनीतिक तनाव, बदलते व्यापार संबंधों, सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों और तेजी से हो रहे तकनीकी बदलावों जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है।
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का मुख्य विषय “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” यानी “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण” है। इस थीम के माध्यम से भारत आर्थिक मजबूती, नई तकनीकों और नवाचार, टिकाऊ विकास तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच बेहतर सहयोग पर जोर दे रहा है।
भारत के लिए ब्रिक्स केवल कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने का मंच नहीं है। यह समूह व्यापार, निवेश, वित्त, तकनीक, ऊर्जा, डिजिटल भुगतान, बुनियादी ढांचे और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए भी एक अहम मंच बन चुका है।
ब्रिक्स के सदस्य देश मिलकर दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा व्यापार में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान है।
इसलिए 2026 का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए अपनी आर्थिक साझेदारी मजबूत करने, भारतीय कंपनियों के लिए नए बाजारों तक पहुंच बढ़ाने, विदेशी निवेश को आकर्षित करने और डिजिटल सहयोग को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है।
इसके साथ ही, यह सम्मेलन भारत को ग्लोबल साउथ की एक प्रभावशाली और महत्वपूर्ण आवाज के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करने में भी मदद कर सकता है।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 भारत के लिए अर्थव्यवस्था, व्यापार और निवेश के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण आयोजन है। इस सम्मेलन के जरिए भारत को दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपने आर्थिक और कारोबारी संबंधों को मजबूत करने का अवसर मिलेगा।
भारत 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। भारत ने 1 जनवरी 2026 को ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली थी। यह चौथी बार है जब भारत को इस समूह की अध्यक्षता करने का अवसर मिला है। वर्ष 2026 ब्रिक्स के औपचारिक समूह के रूप में स्थापित होने के दो दशक पूरे होने का वर्ष भी है।
भारत ने अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता के लिए “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” यानी “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए निर्माण” को थीम बनाया है।
इस थीम के जरिए भारत ब्रिक्स को अधिक व्यावहारिक और समाधान-केंद्रित मंच बनाने पर जोर दे रहा है। इसमें अर्थव्यवस्था को मजबूत और संकटों के प्रति अधिक सक्षम बनाने, तकनीकी नवाचार को बढ़ावा देने, सतत विकास को आगे बढ़ाने और सदस्य देशों के बीच सहयोग को बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान व्यापार, शहरी विकास, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण, संस्कृति, अंतरिक्ष, तकनीक और आर्थिक सहयोग जैसे कई क्षेत्रों में बैठकें और चर्चाएं आयोजित की हैं। उदाहरण के लिए, अगस्त 2026 में जयपुर में आयोजित ब्रिक्स व्यापार मंत्रियों की बैठक में भारत की अध्यक्षता की थीम के तहत आर्थिक और व्यापारिक सहयोग को आगे बढ़ाने पर चर्चा की गई।
ब्रिक्स की शुरुआत पांच देशों के समूह के रूप में हुई थी। इनमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे। इसके बाद समूह का काफी विस्तार हुआ है।
2026 में ब्रिक्स में कुल 11 सदस्य देश शामिल हैं। ये देश हैं।
ब्राजील।
रूस।
भारत।
चीन।
दक्षिण अफ्रीका।
मिस्र।
इथियोपिया।
ईरान।
संयुक्त अरब अमीरात।
सऊदी अरब।
इंडोनेशिया।
भारत सरकार के अनुसार, ये 11 देश मिलकर दुनिया की लगभग 49.5 प्रतिशत आबादी, वैश्विक GDP का करीब 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार का लगभग 26 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं।
ब्रिक्स के विस्तार से इस समूह का आर्थिक और भौगोलिक महत्व काफी बढ़ गया है। अब इसमें दुनिया की प्रमुख विनिर्माण अर्थव्यवस्थाएं, बड़े ऊर्जा उत्पादक देश, विशाल उपभोक्ता बाजार और तेजी से विकास कर रही अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं।
भारत के लिए ब्रिक्स का यह व्यापक सदस्य आधार एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ व्यापारिक और कारोबारी संबंध मजबूत करने के नए अवसर पैदा करता है।
ब्रिक्स भारत को कई प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ एक ही मंच पर आर्थिक और व्यापारिक संबंध मजबूत करने का अवसर देता है। भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ब्रिक्स का महत्व कई अलग-अलग लेकिन आपस में जुड़े क्षेत्रों से समझा जा सकता है।
व्यापार उन प्रमुख क्षेत्रों में से एक है, जिसके जरिए ब्रिक्स भारत की आर्थिक वृद्धि में योगदान दे सकता है।
ब्रिक्स के सदस्य देश मिलकर एक बहुत बड़ा उपभोक्ता बाजार बनाते हैं। ऐसे में भारतीय कंपनियों के लिए दवाइयों, इंजीनियरिंग उत्पादों, रसायनों, मशीनरी, कपड़ा, कृषि उत्पादों, सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं और अन्य वस्तुओं का निर्यात बढ़ाने की संभावनाएं बन सकती हैं।
वाणिज्य मंत्रालय Ministry of Commerce के अनुसार, 2023 में ब्रिक्स देशों का वैश्विक GDP में लगभग 27 प्रतिशत, दुनिया की कुल आबादी में करीब 45 प्रतिशत और वैश्विक वस्तु व्यापार में लगभग 19.6 प्रतिशत हिस्सा था। इसी अवधि में ब्रिक्स देशों को भारत का निर्यात देश के कुल निर्यात का लगभग 18 प्रतिशत था।
ये आंकड़े बताते हैं कि ब्रिक्स देशों के साथ आर्थिक सहयोग को और मजबूत करना भारतीय निर्यातकों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2024–25 में भारत का वस्तुओं और सेवाओं का कुल निर्यात रिकॉर्ड 825.25 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। यह उपलब्धि भारत के लिए अपने निर्यात बाजारों में विविधता लाने और ब्रिक्स जैसे बड़े बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए मजबूत आधार प्रदान करती है।
भारत के लिए ब्रिक्स से मिलने वाला एक बड़ा आर्थिक लाभ विदेशी बाजारों तक बेहतर पहुंच हो सकता है।
जब कोई कंपनी दूसरे देश में अपना कारोबार बढ़ाना चाहती है, तो उसे कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें आयात शुल्क, अलग-अलग नियम, सीमा शुल्क की प्रक्रियाएं, परिवहन और लॉजिस्टिक्स की लागत तथा अन्य व्यापारिक बाधाएं शामिल हैं। ब्रिक्स के मंच पर इन बाधाओं की पहचान करने और व्यापार को आसान बनाने के तरीकों पर चर्चा की जा सकती है।
ब्रिक्स के व्यापार तंत्र में व्यापार को आसान बनाने, कृषि व्यापार, पर्यावरण से जुड़े व्यापारिक उपायों, वैल्यू चेन में सहयोग, ई-कॉमर्स और विशेष आर्थिक क्षेत्रों जैसे विषयों पर पहले ही चर्चा हो चुकी है।
भारतीय MSMEs यानी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए व्यापार प्रक्रियाओं में सुधार और मजबूत कारोबारी नेटवर्क काफी फायदेमंद हो सकते हैं। इससे इन छोटे और मध्यम व्यवसायों के लिए अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों तक पहुंच बनाना आसान हो सकता है।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत को अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के बीच अपनी आर्थिक संभावनाओं को सामने रखने का अवसर भी दे सकता है।
भारत पहले से ही विदेशी निवेश आकर्षित करने, विनिर्माण को बढ़ावा देने और अपनी सप्लाई चेन को मजबूत बनाने के लिए कई नीतियों पर काम कर रहा है। ब्रिक्स देशों के साथ मजबूत आर्थिक संबंध इन प्रयासों को और गति दे सकते हैं।
निम्नलिखित क्षेत्रों में निवेश के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
विनिर्माण।
नवीकरणीय ऊर्जा।
बुनियादी ढांचा।
डिजिटल तकनीक।
वित्तीय सेवाएं।
फार्मास्युटिकल्स।
इलेक्ट्रॉनिक्स।
लॉजिस्टिक्स।
कृषि और खाद्य प्रसंस्करण।
अंतरिक्ष और उन्नत तकनीक।
हालांकि, केवल कूटनीतिक बातचीत से निवेश अपने आप नहीं बढ़ेगा। इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि देशों के बीच कितने ठोस समझौते होते हैं, परियोजनाओं को कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है, नियम और नीतियां कितनी अनुकूल रहती हैं और कंपनियां इन अंतरराष्ट्रीय संबंधों को वास्तविक कारोबारी अवसरों में बदल पाती हैं या नहीं।
डिजिटल वित्तीय ढांचा अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहयोग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है।
भारत ने डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में तेजी से विकास किया है और UPI इसके सबसे प्रमुख उदाहरणों में से एक है। दूसरे देशों के साथ डिजिटल भुगतान की कनेक्टिविटी बढ़ने से कारोबारियों, पर्यटकों और आम उपभोक्ताओं के लिए अंतरराष्ट्रीय लेनदेन आसान हो सकते हैं।
इसलिए भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान सीमा-पार डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में सहयोग एक महत्वपूर्ण विषय हो सकता है।
इसका उद्देश्य केवल किसी मौजूदा व्यवस्था के विकल्प के रूप में नई भुगतान प्रणाली बनाना नहीं है। इसका व्यापक लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय लेनदेन को तेज, कम खर्चीला और अधिक लोगों की पहुंच में लाना है।
भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर यानी DPI का अनुभव भी ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन सकता है।
डिजिटल पहचान, डिजिटल भुगतान, डेटा आधारित सार्वजनिक सेवाओं और खुले डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े भारत के मॉडल ने दुनिया के कई देशों का ध्यान आकर्षित किया है। भारत दूसरे उभरते देशों के साथ तकनीकी जानकारी और सफल अनुभव साझा कर सकता है। इससे भारतीय टेक्नोलॉजी कंपनियों और डिजिटल सेवा प्रदाताओं के लिए भी नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
इस तरह का सहयोग उन देशों में वित्तीय समावेशन को बढ़ाने में भी मदद कर सकता है, जहां बड़ी संख्या में लोग अभी तक औपचारिक बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं से जुड़े नहीं हैं।
दुनिया की व्यापार व्यवस्था तेजी से बदल रही है। भू-राजनीतिक तनाव, आयात शुल्क, सप्लाई चेन में रुकावट और किसी एक बाजार पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता जैसी चुनौतियां दुनियाभर के कारोबारों के लिए चिंता का विषय बन रही हैं।
ऐसे माहौल में आर्थिक विविधता यानी अलग-अलग देशों और बाजारों के साथ व्यापारिक संबंध बनाना पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
ब्रिक्स भारत को सप्लाई चेन को मजबूत बनाने और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर चर्चा के लिए एक अतिरिक्त मंच प्रदान कर सकता है।
भारत अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान निम्नलिखित क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दे सकता है।
महत्वपूर्ण सप्लाई चेन।
विनिर्माण।
खाद्य सुरक्षा।
ऊर्जा सुरक्षा।
डिजिटल व्यापार।
लॉजिस्टिक्स।
बुनियादी ढांचा।
तकनीक।
हरित उद्योग।
इस सहयोग का उद्देश्य ब्रिक्स देशों को बाकी दुनिया के बाजारों से अलग करना नहीं होना चाहिए। इसके बजाय, मजबूत ब्रिक्स सहयोग से सदस्य देशों को व्यापार और निवेश के लिए अतिरिक्त विकल्प मिल सकते हैं, जबकि वे वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जुड़े रह सकते हैं।
भारत खुद को दुनिया के प्रमुख विनिर्माण और सप्लाई चेन केंद्रों में शामिल करने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है।
बदलते वैश्विक आर्थिक माहौल के कारण कई कंपनियां अपने विनिर्माण केंद्रों को अलग-अलग देशों में फैलाने पर विचार कर रही हैं। भारत के पास एक बड़ा घरेलू बाजार, तेजी से विकसित होता बुनियादी ढांचा, कुशल कार्यबल और बढ़ता हुआ तकनीकी क्षेत्र है। इन खूबियों के आधार पर भारत देश में अधिक निवेश आकर्षित कर सकता है।
ब्रिक्स देशों के साथ सहयोग भारत की इस रणनीति को और मजबूत कर सकता है। इसके जरिए भारत में बने उत्पादों के लिए अतिरिक्त विदेशी बाजार उपलब्ध हो सकते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मास्युटिकल्स, मशीनरी, रसायन और नवीकरणीय ऊर्जा उपकरण जैसे क्षेत्रों को मजबूत व्यापारिक और निवेश संबंधों का लाभ मिल सकता है।
हालांकि, भारत का दीर्घकालिक लक्ष्य केवल निर्यात की मात्रा बढ़ाना नहीं होना चाहिए। देश को उच्च मूल्य वाले उत्पादों के निर्माण, तकनीक आधारित उत्पादन और वैश्विक वैल्यू चेन में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने पर भी ध्यान देना चाहिए।
ऊर्जा भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
भारत दुनिया की प्रमुख ऊर्जा खपत वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, जबकि ब्रिक्स के कई सदस्य देश बड़े ऊर्जा उत्पादक हैं। ऐसे में इन देशों के बीच मजबूत सहयोग भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर असर डाल सकता है।
ऊर्जा के क्षेत्र में संभावित सहयोग के प्रमुख क्षेत्र इस प्रकार हैं।
तेल और गैस में सहयोग।
नवीकरणीय ऊर्जा।
परमाणु ऊर्जा।
ग्रीन हाइड्रोजन।
ऊर्जा-कुशल तकनीक।
महत्वपूर्ण खनिज।
स्वच्छ ऊर्जा के लिए वित्तपोषण।
भारत के लिए अलग-अलग देशों के साथ ऊर्जा संबंध मजबूत करना महत्वपूर्ण है। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में अचानक होने वाले बदलावों और आपूर्ति में रुकावट जैसी परिस्थितियों से होने वाले जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
इसके साथ ही, नवीकरणीय ऊर्जा और टिकाऊ तकनीकों पर ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग भारत के जलवायु लक्ष्यों और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की व्यापक रणनीति के अनुरूप भी है।
आज तकनीक किसी भी देश की आर्थिक प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण आधार बन चुकी है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा, क्वांटम तकनीक, अंतरिक्ष तकनीक और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्र दुनियाभर के उद्योगों को तेजी से बदल रहे हैं।
भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता उभरती हुई तकनीकों के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।
भारत ब्रिक्स देशों के बीच संयुक्त शोध, तकनीकी ज्ञान का आदान-प्रदान, स्टार्टअप सहयोग और ज्ञान साझा करने की व्यवस्थाओं को बढ़ावा दे सकता है।
इस तरह की पहल विकासशील देशों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है। कई देश महंगी विदेशी तकनीकों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय कम लागत वाली और अपनी जरूरतों के अनुसार तकनीकी समाधान चाहते हैं।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, अंतरिक्ष तकनीक, डिजिटल भुगतान और तकनीक आधारित सार्वजनिक सेवाओं के क्षेत्र में भारत का अनुभव भी ब्रिक्स देशों के साथ सहयोग में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
भारत के स्टार्टअप और MSMEs यानी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम भी ब्रिक्स देशों के बीच बढ़ते आर्थिक सहयोग से लाभ उठा सकते हैं।
MSMEs को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में विस्तार करते समय अक्सर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें विदेशी बाजारों तक सीमित पहुंच, सही कारोबारी जानकारी की कमी, अलग-अलग नियमों को समझने में कठिनाई और वित्तीय संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं शामिल हैं।
ब्रिक्स देशों के कारोबारों के बीच सीधे कारोबारी संपर्क बढ़ने से भारतीय कंपनियों को नए ग्राहकों और कारोबारी साझेदारों की तलाश में मदद मिल सकती है।
स्टार्टअप एक्सचेंज कार्यक्रम, इनोवेशन नेटवर्क, बिजनेस फोरम और तकनीकी साझेदारी भारतीय उद्यमियों के लिए नए अवसर पैदा कर सकते हैं।
संभावित लाभों में निम्नलिखित अवसर शामिल हैं।
नए निर्यात बाजार।
अंतरराष्ट्रीय कारोबारी साझेदारी।
तकनीकी सहयोग।
निवेशकों तक पहुंच।
संयुक्त उद्यम।
सप्लाई चेन में एकीकरण।
ज्ञान और अनुभव साझा करना।
हालांकि, इन अवसरों का वास्तविक लाभ तभी मिल पाएगा, जब भारतीय कारोबारों को व्यावहारिक सहायता मिले और विदेशी बाजारों तक उनकी पहुंच वास्तव में आसान हो। केवल अंतरराष्ट्रीय बैठकों और समझौतों से पर्याप्त परिणाम हासिल नहीं होंगे। व्यापारिक प्रक्रियाओं में सुधार, वित्त तक बेहतर पहुंच और बाजार संबंधी जानकारी भी उतनी ही जरूरी होगी।
वित्तीय सहयोग ब्रिक्स का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी NDB New Development Bank (NDB) की स्थापना उभरती अर्थव्यवस्थाओं में बुनियादी ढांचे और सतत विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने के उद्देश्य से की गई थी।
भारत के लिए NDB जैसी संस्थाएं बुनियादी ढांचे के विकास में मदद कर सकती हैं और विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त जुटाने का एक अतिरिक्त माध्यम उपलब्ध करा सकती हैं।
इसके तहत परिवहन, नवीकरणीय ऊर्जा, शहरी बुनियादी ढांचे, जल प्रबंधन और सतत विकास से जुड़ी अन्य परियोजनाओं जैसे क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं हो सकती हैं।
इस तरह ब्रिक्स के भीतर मजबूत वित्तीय सहयोग भारत की बुनियादी ढांचा विकास योजनाओं को अतिरिक्त समर्थन दे सकता है।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी का सबसे तत्काल आर्थिक प्रभाव दिल्ली और पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी NCR में दिखाई दे सकता है।
किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विभिन्न देशों से प्रतिनिधिमंडल, अधिकारी, कारोबारी प्रतिनिधि, मीडिया संगठन और अन्य लोग राजधानी पहुंचते हैं। इससे कुछ समय के लिए स्थानीय कारोबार और सेवाओं की मांग बढ़ सकती है।
इस दौरान निम्नलिखित क्षेत्रों में मांग बढ़ने की संभावना रहती है।
होटल।
रेस्तरां।
परिवहन सेवाएं।
रिटेल कारोबार।
इवेंट और आयोजन सेवाएं।
बिजनेस सुविधाएं।
प्रोफेशनल सेवाएं।
हालांकि, इसका दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव तब अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है, जब शिखर सम्मेलन के बाद भी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और निवेशकों की दिल्ली-NCR में कारोबारी रुचि बढ़ती है।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन दिल्ली-NCR को अंतरराष्ट्रीय कारोबार और निवेश के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में पहचान दिलाने में योगदान दे सकता है। हालांकि, इसे संपत्ति की कीमतों में बढ़ोतरी की पक्की वजह मानना सही नहीं होगा।
नोएडा NCR में एक प्रमुख तकनीकी, वाणिज्यिक और कारोबारी केंद्र के रूप में विकसित हुआ है। दिल्ली से इसकी बेहतर कनेक्टिविटी और लगातार बढ़ता बुनियादी ढांचा इसे क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका देता है।
अंतरराष्ट्रीय कारोबारी गतिविधियों में बढ़ोतरी से लंबे समय में ऑफिस स्पेस, कमर्शियल प्रोजेक्ट्स और अच्छी गुणवत्ता वाली आवासीय परियोजनाओं की मांग को समर्थन मिल सकता है।
ग्रेटर नोएडा में आवासीय, वाणिज्यिक और संस्थागत विकास की काफी संभावनाएं हैं। बुनियादी ढांचे का विस्तार और बेहतर कनेक्टिविटी इसके लंबे समय के विकास को बढ़ावा दे सकती है।
हालांकि, निवेशकों को केवल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के आधार पर किसी संपत्ति में निवेश करने के बजाय प्रत्येक प्रोजेक्ट की अलग-अलग जांच करनी चाहिए। किसी सम्मेलन की मेजबानी अपने आप संपत्ति की कीमत बढ़ने की गारंटी नहीं देती है।
गुरुग्राम NCR के सबसे मजबूत कॉरपोरेट बाजारों में से एक है। यहां बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां, आधुनिक ऑफिस प्रोजेक्ट्स, टेक्नोलॉजी कंपनियां और प्रीमियम आवासीय संपत्तियों की मजबूत मांग मौजूद है।
अंतरराष्ट्रीय कारोबारी गतिविधियों में लगातार बढ़ोतरी से प्रीमियम कमर्शियल स्पेस और हॉस्पिटैलिटी इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग को समर्थन मिल सकता है।
सेंट्रल दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली प्रीमियम आवासीय, वाणिज्यिक और हॉस्पिटैलिटी प्रॉपर्टी के महत्वपूर्ण बाजार बने हुए हैं। इसका एक प्रमुख कारण इन क्षेत्रों की सरकारी संस्थानों, राजनयिक प्रतिष्ठानों और प्रमुख कारोबारी क्षेत्रों से नजदीकी है।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से दिल्ली की अंतरराष्ट्रीय पहचान और कारोबारी गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि, रियल एस्टेट पर इसका वास्तविक और लंबे समय का प्रभाव कई अन्य आर्थिक, बुनियादी ढांचागत और बाजार संबंधी कारकों पर भी निर्भर करेगा।
ऐसा मानने का कोई ठोस आधार नहीं है कि केवल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की वजह से दिल्ली-NCR में संपत्ति की कीमतों में अचानक बड़ी बढ़ोतरी हो जाएगी।
रियल एस्टेट बाजार का प्रदर्शन कई अलग-अलग कारकों पर निर्भर करता है। इनमें निम्नलिखित प्रमुख कारक शामिल हैं।
बुनियादी ढांचे का विकास।
रोजगार के अवसरों में वृद्धि।
कारोबारी गतिविधियों का विस्तार।
बेहतर कनेक्टिविटी।
आवास की मांग और आपूर्ति।
ब्याज दरें।
किराये की मांग।
प्रोजेक्ट की गुणवत्ता।
डेवलपर की प्रतिष्ठा।
सरकारी नीतियां।
स्थानीय आर्थिक परिस्थितियां।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से दिल्ली-NCR की अंतरराष्ट्रीय पहचान बढ़ सकती है और कुछ समय के लिए आर्थिक गतिविधियों में तेजी आ सकती है। हालांकि, रियल एस्टेट में निवेश का फैसला केवल सम्मेलन के आधार पर नहीं होना चाहिए। निवेशकों को किसी भी प्रॉपर्टी का मूल्यांकन उसके लंबे समय के विकास की संभावनाओं और वास्तविक बाजार परिस्थितियों के आधार पर करना चाहिए।
ब्रिक्स भारत के लिए कई अवसर लेकर आता है, लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी हैं।
विस्तारित ब्रिक्स समूह में अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक संरचनाओं और रणनीतिक प्राथमिकताओं वाले देश शामिल हैं। भारत के ब्रिक्स के अंदर और बाहर दोनों ही तरह के देशों के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक और भू-राजनीतिक संबंध हैं।
इसलिए भारत को ब्रिक्स के साथ आगे बढ़ते समय संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत होगी।
एक बड़ी चुनौती यह भी है कि घोषणाओं और बैठकों को वास्तविक आर्थिक परिणामों में कैसे बदला जाए। व्यापार और निवेश सहयोग को सफल बनाने के लिए ठोस व्यवस्था, कारोबारों की भागीदारी, नियमों में तालमेल और प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है।
सदस्य देशों के बीच अलग-अलग हित और प्राथमिकताएं होने के कारण कई मुद्दों पर सहमति बनाना भी मुश्किल हो सकता है।
इसलिए भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता की सफलता केवल आयोजित बैठकों या जारी किए गए घोषणापत्रों की संख्या से तय नहीं होगी। इसकी असली सफलता इस बात से मापी जाएगी कि शिखर सम्मेलन के बाद कितनी व्यावहारिक योजनाएं आगे बढ़ती हैं और उनका वास्तविक आर्थिक लाभ कितना मिलता है।
भारत के लिए ब्रिक्स का दीर्घकालिक महत्व आर्थिक विविधता को मजबूत करने की इसकी क्षमता में है।
भारत को अपनी अर्थव्यवस्था के लिए किसी एक आर्थिक समूह या किसी एक बाजार पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। इसके बजाय, भारत दुनिया की अर्थव्यवस्था से जुड़ा रहते हुए अलग-अलग क्षेत्रों और देशों के साथ अपने व्यापारिक और आर्थिक संबंध मजबूत कर सकता है।
ब्रिक्स इस रणनीति में भारत की मदद कर सकता है। इसके जरिए भारत।
अपने निर्यात बाजारों का विस्तार कर सकता है।
सप्लाई चेन से जुड़ी साझेदारियों को मजबूत कर सकता है।
विदेशी और अंतरराष्ट्रीय निवेश आकर्षित कर सकता है।
डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा दे सकता है।
भारतीय MSMEs को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाने में मदद कर सकता है।
तकनीकी साझेदारी को आगे बढ़ा सकता है।
ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग मजबूत कर सकता है।
बुनियादी ढांचे के लिए वित्त जुटाने के नए अवसर तलाश सकता है।
वैश्विक आर्थिक मुद्दों पर अपनी आवाज और प्रभाव को मजबूत कर सकता है।
ग्लोबल साउथ के देशों के साथ मजबूत संबंध बना सकता है।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 भारत के लिए केवल एक कूटनीतिक बैठक नहीं है। यह भारत के लिए यह दिखाने का अवसर भी है कि एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था बहुपक्षीय सहयोग के माध्यम से व्यापार, निवेश, नवाचार और सतत विकास को कैसे आगे बढ़ा सकती है।
भारत की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विस्तारित ब्रिक्स समूह अब दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक GDP के करीब 40 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है।
शिखर सम्मेलन के तत्काल लाभ नई दिल्ली और पूरे NCR में बढ़ती कारोबारी गतिविधियों, अंतरराष्ट्रीय ध्यान और होटल, परिवहन, रेस्तरां तथा अन्य सेवाओं की बढ़ती मांग के रूप में दिखाई दे सकते हैं। हालांकि, इसका अधिक महत्वपूर्ण आर्थिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि शिखर सम्मेलन के बाद क्या कदम उठाए जाते हैं।
भारत के लिए ब्रिक्स की सफलता का वास्तविक आकलन बेहतर बाजार पहुंच, मजबूत निवेश प्रवाह, सप्लाई चेन में बेहतर भागीदारी, तकनीकी सहयोग, आसान वित्तीय कनेक्टिविटी और कारोबारियों तथा उद्यमियों के लिए नए अवसरों के आधार पर किया जाना चाहिए।
ब्रिक्स एक मंच उपलब्ध करा सकता है, लेकिन लंबे समय तक आर्थिक लाभ हासिल करने के लिए ठोस कदम और प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी होगा। भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी कूटनीतिक नेतृत्व क्षमता को व्यावहारिक आर्थिक परिणामों में बदलने की है। इसके साथ ही, भारत को ब्रिक्स देशों के साथ-साथ दुनिया के अन्य देशों और वैश्विक बाजारों के साथ भी मजबूत और संतुलित संबंध बनाए रखने होंगे।