फास्ट-फूड चेन, महंगे कैफे और क्विक-कॉमर्स डिलीवरी ऐप्स के आने से पहले भारतीय बच्चों का बचपन छोटी-छोटी खुशियों से भरा होता था। उस समय जेब में रखे ₹1, ₹2 या ₹5 के सिक्के की खनक ही सबसे बड़ी खुशी होती थी। स्कूल की छुट्टी होते ही बच्चे दौड़कर अपने मोहल्ले की किराना दुकान पर पहुंच जाते थे, जहां उनका पसंदीदा स्नैक उनका इंतजार कर रहा होता था।
गर्मी के दिनों में ठंडा आम का जूस पीना, दोस्तों के साथ कैंडी रिंग पहनकर मजेदार मुकाबले करना या शाम को क्रिकेट खेलने के बाद गरमा-गरम इंस्टेंट नूडल्स खाने का इंतजार करना, ये सब सिर्फ खाने-पीने की बातें नहीं थीं। ये हमारे बचपन की सबसे खूबसूरत यादों का हिस्सा थीं।
90 और 2000 के दशक में ये स्नैक्स हर बच्चे की जिंदगी का अहम हिस्सा थे। टीवी देखते समय, स्कूल की लंच ब्रेक में दोस्तों के साथ स्नैक्स बदलकर खाना या गर्मी की छुट्टियों में दादा-दादी और नाना-नानी के घर इनका स्वाद लेना, ये पल आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं।
इन स्नैक्स ने सिर्फ हमारी यादों को ही नहीं संजोया, बल्कि भारत के फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) उद्योग की मजबूत नींव रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज भारत का नमकीन और मीठे स्नैक्स का बाजार वर्ष 2025 में ₹50,590 करोड़ (6 अरब डॉलर) से अधिक का हो चुका है।
अनुमान है कि यह बाजार 2034 तक बढ़कर ₹103,556 करोड़ तक पहुंच जाएगा और इस दौरान 8.28% की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर (CAGR) से आगे बढ़ेगा। इस विकास में उन लोकप्रिय स्नैक्स का बड़ा योगदान है, जिन्होंने कई पीढ़ियों के बचपन को यादगार बनाया।
आइए जानते हैं भारत के ऐसे 10 मशहूर स्नैक्स 10 Famous Indian Snacks के बारे में, जिन्होंने एक पूरी पीढ़ी के बचपन को खास बनाया और जो आज भी भारतीय घरों में उतने ही पसंद किए जाते हैं।
जब नेस्ले ने वर्ष 1983 में भारत में मैगी 2-मिनट नूडल्स लॉन्च किए, तब कई लोगों को लगा कि यह उत्पाद भारतीय बाजार में सफल नहीं होगा। उस समय भारत में ज्यादातर लोग घर का ताजा बना खाना ही पसंद करते थे। ऐसे में पैकेट में मिलने वाले इंस्टेंट नूडल्स का विचार लोगों के लिए बिल्कुल नया था।
लेकिन नेस्ले ने बेहतरीन रणनीति अपनाई। कंपनी ने मैगी को खाने का विकल्प नहीं, बल्कि स्कूल से घर लौटने वाले बच्चों के लिए सबसे पसंदीदा शाम का हल्का नाश्ता बनाकर पेश किया। यही रणनीति इसकी सबसे बड़ी सफलता बनी।
लोकप्रिय टैगलाइन: "Fast to Cook, Good to Eat" और खास मसाला फ्लेवर।
बिक्री की रणनीति: देशभर की किराना दुकानों तक आसान उपलब्धता और कम कीमत वाले छोटे पैक।
परिणाम: तैयार खाद्य (Prepared Dishes) श्रेणी में 60% से अधिक बाजार हिस्सेदारी।
मैगी की खुशबू, जिसमें मसालों, लहसुन और खास स्वाद का मिश्रण होता है, बच्चों के लिए स्कूल खत्म होने और आराम का संकेत बन गई। समय के साथ लोगों ने इसे अपने-अपने अंदाज में बनाना शुरू किया। कोई इसमें मक्खन और हरी मिर्च डालता था, तो कोई मटर, टमाटर और दूसरी सब्जियां मिलाकर इसे और स्वादिष्ट बना देता था।
आज भी मैगी नेस्ले इंडिया के सबसे लोकप्रिय उत्पादों में से एक है। कंपनी के "Prepared Dishes and Cooking Aids" कारोबार की मजबूत बिक्री में मैगी की बड़ी भूमिका है। Q1 2026 में नेस्ले इंडिया का कुल परिचालन राजस्व ₹6,363.3 करोड़ रहा, जिसमें शहरी और ग्रामीण दोनों बाजारों में मैगी की मजबूत मांग का अहम योगदान रहा।
इसके अलावा, क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग से मैगी की बिक्री और भी बढ़ी है। यही वजह है कि जो मैगी कभी 1990 के दशक के बच्चों की पहली पसंद थी, वह आज भी छात्रों, नौकरीपेशा लोगों और परिवारों की पसंदीदा इंस्टेंट स्नैक बनी हुई है।
अगर भारत के सबसे लोकप्रिय बिस्कुट की बात हो, तो पारले-जी का नाम सबसे पहले आता है। इसकी शुरुआत 1939 में मुंबई के विले पार्ले में Parle Gluco नाम से हुई थी। उस समय इसे ब्रिटिश बिस्कुटों के स्वदेशी विकल्प के रूप में बाजार में उतारा गया था। बाद में 1980 में इसका नाम बदलकर Parle-G कर दिया गया। शुरुआत में "G" का मतलब Glucose था, लेकिन बाद में इसे "G for Genius" अभियान के जरिए नई पहचान मिली।
1939: पारले ग्लूको के नाम से शुरुआत।
1980: नाम बदलकर Parle-G रखा गया और "G for Genius" अभियान शुरू हुआ।
2025: कंपनी का परिचालन राजस्व ₹15,568.49 करोड़ तक पहुंचा।
कई पीढ़ियों के भारतीय बच्चों के लिए चाय या दूध में पारले-जी डुबोकर खाना रोजमर्रा की आदत थी। सफेद रंग के पैकेट पर बनी पारले-जी गर्ल की तस्वीर आज भी लोगों के मन में बचपन की यादें ताजा कर देती है।
पारले ने हमेशा अपने बिस्कुट को कम कीमत पर उपलब्ध कराया। ₹1, ₹2 और ₹5 के छोटे पैक ने इसे शहरों के साथ-साथ गांवों तक पहुंचाया। यही वजह है कि पारले-जी हर वर्ग के लोगों की पहुंच में रहा।
FY25 में पारले प्रोडक्ट्स का परिचालन राजस्व ₹15,568.49 करोड़ रहा। कंपनी ने इस दौरान ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज़ जैसी बड़ी कंपनियों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा जारी रखी। पारले की सबसे बड़ी ताकत इसका इकोनॉमी प्राइस सेगमेंट है, जिसकी भारतीय बिस्कुट और कन्फेक्शनरी बाजार में 49.6% हिस्सेदारी है।
महंगाई बढ़ने के बावजूद कंपनी ने छोटे पैक और स्मार्ट पैकेजिंग रणनीति अपनाकर अपने उत्पाद को आम लोगों की पहुंच में बनाए रखा। यही कारण है कि पारले-जी आज भी भारत के सबसे भरोसेमंद और सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले बिस्कुटों में शामिल है।
भारतीय टॉफियों की दुनिया में पारले मेलोडी का नाम आज भी लोगों के दिलों में खास जगह रखता है। 1990 के दशक में इसका मशहूर विज्ञापन और टैगलाइन हर बच्चे की जुबान पर हुआ करती थी।
"Melody itni chocolaty kyun hai? Melody khao, khud jaan jao!"
इस एक लाइन ने मेलोडी को सिर्फ एक टॉफी नहीं, बल्कि हर घर की पहचान बना दिया।
पारले प्रोडक्ट्स द्वारा लॉन्च की गई मेलोडी अपने अनोखे स्वाद की वजह से बाकी टॉफियों से अलग थी। इसके बाहर की परत मुलायम कैरेमल की होती थी, जबकि अंदर स्वादिष्ट लिक्विड चॉकलेट भरी होती थी। यही दोहरा स्वाद बच्चों और बड़ों दोनों को खूब पसंद आता था।
बाहरी परत: मुलायम और स्वादिष्ट कैरेमल।
अंदर का हिस्सा: गाढ़ी और क्रीमी चॉकलेट।
स्कूलों में जन्मदिन के मौके पर बच्चों के बीच मेलोडी बांटना एक आम बात थी। कई बच्चे अपने सबसे अच्छे दोस्तों को दो टॉफियां देते थे, जबकि बाकी दोस्तों को एक-एक मेलोडी मिलती थी। इससे मेलोडी सिर्फ एक टॉफी नहीं, बल्कि दोस्ती और खुशियों का हिस्सा बन गई।
सिर्फ ₹1 में मिलने वाली इस टॉफी ने अपने अनोखे स्वाद और शानदार विज्ञापन की बदौलत करोड़ों लोगों का दिल जीत लिया। आज भी भारत के चॉकलेट बाजार में इसकी पहचान बनी हुई है। वर्ष 2025 में भारत के चॉकलेट उत्पादों की बाजार हिस्सेदारी 36.5% रही, जिसमें मेलोडी जैसे लोकप्रिय उत्पाद आज भी खास स्थान रखते हैं। खासकर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में इसकी लोकप्रियता बरकरार है।
1985 में पारले एग्रो द्वारा फ्रूटी लॉन्च होने से पहले गर्मियों के अलावा आम का स्वाद लेना आसान नहीं था। उस समय लोगों के पास कांच की बोतलों में मिलने वाले पेय या घर में बने शरबत ही विकल्प हुआ करते थे।
फ्रूटी ने भारतीय पेय बाजार में बड़ा बदलाव लाते हुए टेट्रा पैक में मैंगो ड्रिंक पेश किया। हरे रंग का छोटा डिब्बा और उसके साथ मिलने वाली स्ट्रॉ बच्चों के लिए बेहद आकर्षक थी।
पहले: कांच की भारी बोतलें, जिन्हें वापस करना पड़ता था।
फ्रूटी के बाद: हल्का, साफ-सुथरा और आसानी से साथ ले जाने वाला टेट्रा पैक।
1990 के दशक में बच्चे स्ट्रॉ से फ्रूटी के पैक को छेदकर पीने का मजा कभी नहीं भूल सकते। इसका मशहूर जिंगल—
"Mango Frooti, Fresh and Juicy."
रेडियो और टीवी पर खूब सुनाई देता था। स्कूल पिकनिक, जन्मदिन की पार्टियां और गर्मियों में क्रिकेट खेलने के बाद फ्रूटी बच्चों की पहली पसंद बन गई।
FY25 में पारले एग्रो का कुल परिचालन राजस्व ₹3,284.13 करोड़ रहा, जबकि कंपनी का शुद्ध लाभ बढ़कर ₹115.38 करोड़ पहुंच गया। आज बाजार में माज़ा और स्लाइस जैसे कई बड़े ब्रांड मौजूद हैं, लेकिन फ्रूटी ने नई पैकेजिंग, पीईटी बोतलों और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर आसान उपलब्धता के दम पर अपनी मजबूत पहचान बनाए रखी है।
एक समय ऐसा भी था जब बच्चों के बीच फैंटम स्वीट सिगरेट्स काफी लोकप्रिय हुआ करती थीं। हार्निक फूड्स द्वारा बनाई गई यह कैंडी स्कूल के बच्चों के बीच बेहद चर्चित थी।
यह छोटी लाल और सफेद डिब्बी में आती थी, जिस पर मशहूर कॉमिक किरदार द फैंटम (The Phantom) की तस्वीर बनी होती थी। अंदर सफेद रंग की पतली कैंडी स्टिक होती थी, जिसके एक सिरे पर लाल रंग लगाया जाता था, ताकि वह जलती हुई सिगरेट जैसी दिखाई दे।
मुख्य सामग्री: चीनी, ग्लूकोज और हल्का पुदीने का स्वाद।
डिजाइन: सफेद कैंडी स्टिक और लाल रंग का सिरा।
पैकेजिंग: मशहूर The Phantom कॉमिक किरदार वाली डिब्बी।
बच्चे इसे सिर्फ इसके मीठे स्वाद के लिए नहीं खरीदते थे। वे इसे हाथ में पकड़कर बड़े लोगों की तरह अभिनय करते थे और दोस्तों के बीच खुद को "कूल" दिखाने की कोशिश करते थे। यह उस दौर के बच्चों के लिए एक मजेदार खेल जैसा था।
समय के साथ स्वास्थ्य संबंधी नियमों और बदलते कानूनों के कारण ऐसे उत्पादों का उत्पादन काफी कम हो गया। इसके बावजूद फैंटम स्वीट सिगरेट्स आज भी 90 के दशक और शुरुआती 2000 के दशक के बच्चों के लिए बचपन की सबसे यादगार चीजों में से एक मानी जाती हैं और आज भी सोशल मीडिया पर पुरानी यादों के रूप में अक्सर चर्चा में रहती हैं।
कैडबरी (अब मोंडेलेज इंडिया) ने वर्ष 1968 में कैडबरी जेम्स को भारतीय बाजार में लॉन्च किया। रंग-बिरंगी चीनी की परत और अंदर मौजूद स्वादिष्ट मिल्क चॉकलेट ने इसे बच्चों का पसंदीदा स्नैक बना दिया। यह छोटे-छोटे गोल आकार की चॉकलेट होती थी, जिसे पहले फॉयल स्ट्रिप और बाद में छोटे प्लास्टिक ट्यूब पैक में बेचा जाने लगा।
बाहरी परत: रंग-बिरंगी और कुरकुरी चीनी की परत।
अंदर का हिस्सा: स्वादिष्ट और मुलायम मिल्क चॉकलेट।
कैडबरी जेम्स सिर्फ खाने के लिए ही नहीं, बल्कि बच्चों के खेल और मस्ती का भी हिस्सा थी। बच्चे इन्हें रंगों के हिसाब से अलग-अलग रखते थे, घर पर बने जन्मदिन के केक को सजाने में इस्तेमाल करते थे या फिर दोस्तों के साथ यह अंदाजा लगाते थे कि पैकेट से अगला रंग कौन-सा निकलेगा।
कैडबरी के आकर्षक विज्ञापनों और "Raho Umarless" जैसे लोकप्रिय अभियान ने जेम्स को हर उम्र के लोगों के बीच पसंदीदा बना दिया। रंग-बिरंगी पैकिंग और मजेदार प्रचार ने इसे लंबे समय तक बच्चों की पहली पसंद बनाए रखा।
आज भी मोंडेलेज इंडिया के लिए जेम्स एक महत्वपूर्ण चॉकलेट ब्रांड है। भारत के चॉकलेट बाजार में, जहां चॉकलेट उत्पाद कुल कन्फेक्शनरी बिक्री का 36% से अधिक हिस्सा रखते हैं, वहां जेम्स बच्चों की ट्रीट, केक सजाने और त्योहारों पर उपहार देने के लिए लोकप्रिय विकल्प बना हुआ है।
अगर स्कूल के दिनों की सबसे प्यारी यादों की बात हो, तो पारले पॉपिन्स का नाम जरूर आता है। पारले प्रोडक्ट्स ने इसे वर्ष 1950 में लॉन्च किया था। यह अलग-अलग फलों के स्वाद वाली रंग-बिरंगी हार्ड कैंडी का एक रोल होता था, जिसे चांदी रंग की फॉयल और कागज में लपेटकर बेचा जाता था।
(Parle Poppins Color Palette)
लाल: स्ट्रॉबेरी।
नारंगी: संतरा।
पीला: नींबू।
हरा: लाइम।
बैंगनी: ब्लैककरंट।
पॉपिन्स की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ इसका स्वाद नहीं, बल्कि इसे दोस्तों के साथ मिलकर खाने का मजा था। जैसे ही कोई बच्चा स्कूल में पॉपिन्स का रोल खोलता था, उसके आसपास दोस्तों की भीड़ लग जाती थी। हर कोई अपनी पसंद का रंग मांगता था। खासकर लाल और बैंगनी रंग की टॉफियों के लिए बच्चों के बीच छोटी-छोटी नोकझोंक और मजेदार बातचीत होना आम बात थी।
पारले का लोकप्रिय विज्ञापन—
"Duniyadari Chhoro, Poppins Khao."
ने इस टॉफी को बच्चों के बीच और भी लोकप्रिय बना दिया। केवल ₹2 या ₹5 में मिलने वाला यह रंग-बिरंगा रोल स्वाद, दोस्ती और खुशियों का प्रतीक बन गया।
आज भी पॉपिन्स उन लोगों के दिलों में खास जगह रखता है, जिन्होंने 90 के दशक और शुरुआती 2000 के दशक में अपना बचपन बिताया। यह सिर्फ एक टॉफी नहीं, बल्कि उन सुनहरे दिनों की मीठी याद है, जब छोटी-छोटी चीजें भी बड़ी खुशियां दे जाती थीं।
डीएफएम फूड्स (DFM Foods) ने क्रैक्स कॉर्न रिंग्स लॉन्च करके भारत के नमकीन स्नैक्स बाजार में एक नया ट्रेंड शुरू किया। मकई (कॉर्न) से बने ये कुरकुरे रिंग्स चटपटे मसालों से भरपूर होते थे। लेकिन इनकी सबसे बड़ी खासियत इनका स्वाद नहीं, बल्कि इनका अनोखा आकार था।
इन रिंग्स को बच्चे अपनी उंगलियों में अंगूठी की तरह पहन सकते थे और फिर एक-एक करके मजे से खाते थे। यही वजह थी कि क्रैक्स सिर्फ एक स्नैक नहीं, बल्कि बच्चों के लिए खेल और मनोरंजन का भी हिस्सा बन गया।
पहला कदम: पांचों उंगलियों में क्रैक्स रिंग्स पहनना।
दूसरा कदम: दोस्तों को अपनी "रिंग्स वाली उंगलियां" दिखाना।
तीसरा कदम: फिर एक-एक करके उन्हें खाते जाना।
बच्चों को आकर्षित करने के लिए कंपनी हर पैकेट में छोटे-छोटे खिलौने, प्लास्टिक की आकृतियां और कलेक्ट करने वाले कार्ड भी देती थी। इससे हर नया पैकेट खोलने का उत्साह और बढ़ जाता था।
आज भले ही पेप्सिको के कुरकुरे और हल्दीराम जैसे बड़े ब्रांड नमकीन स्नैक्स बाजार में मजबूत स्थिति रखते हों, लेकिन क्रैक्स आज भी अपनी पुरानी यादों और नए फ्लेवर की वजह से लोगों के बीच लोकप्रिय बना हुआ है।
पारले ने वर्ष 1984 में किस्मी टॉफी लॉन्च की। इस टॉफी ने भारतीय बच्चों को एक ऐसा स्वाद दिया, जो उस समय बिल्कुल नया था। इसमें इलायची (Elaichi) की खुशबू को चॉकलेट और कैरेमल के स्वाद के साथ मिलाया गया था।
उस दौर में विदेशी चॉकलेट काफी महंगी होती थीं। ऐसे में किस्मी ने बहुत कम कीमत पर भारतीय स्वाद और चॉकलेट का शानदार मेल लोगों तक पहुंचाया। शुरुआत में इसकी कीमत सिर्फ 25 पैसे थी, जो बाद में ₹1 हो गई।
भारतीय स्वाद: खुशबूदार इलायची।
पश्चिमी स्वाद: क्रीमी कोको और मिल्क चॉकलेट का स्वाद।
सफेद, लाल और सुनहरे रंग की इसकी आकर्षक रैपर पर बने एक जोड़े के चित्र ने इसे आसानी से पहचानने योग्य बना दिया। यह टॉफी स्कूल की कैंटीन और मोहल्ले की दुकानों पर आसानी से मिल जाती थी।
समय के साथ पारले ने किस्मी गोल्ड, किस्मी बार और रोज, राजभोग तथा कुल्फी जैसे नए फ्लेवर भी पेश किए। लेकिन आज भी सबसे ज्यादा याद की जाने वाली किस्मी वही पारंपरिक इलायची-चॉकलेट वाली टॉफी है, जिसने लाखों लोगों के बचपन को मीठी यादों से भर दिया।
भारत में बड़े विदेशी स्नैक ब्रांड आने से पहले अंकल चिप्स आलू के चिप्स की दुनिया का सबसे लोकप्रिय नाम था। इसे 1992 में अमृत एग्रो ने लॉन्च किया था और बाद में 2000 में पेप्सिको ने इसका अधिग्रहण कर लिया।
अंकल चिप्स अपने मोटे, मसालेदार और कुरकुरे आलू के चिप्स के लिए जाना जाता था। इसके पैकेट पर शेफ की टोपी पहने मुस्कुराते हुए अंकल का चित्र बच्चों को खूब पसंद आता था। इसका मशहूर विज्ञापन—
"Bole Mere Lips, I Want Uncle Chipps."
हर घर और बच्चे की जुबान पर था।
इसी दौर में नटखट भी बच्चों का बेहद पसंदीदा स्नैक था। यह हल्के, फूले हुए गेहूं से बना चटपटा नमकीन था, जो छोटे पारदर्शी पैकेट में ₹2 से ₹5 की कीमत पर मिलता था।
अंकल चिप्स (1992): मसालेदार आलू के कुरकुरे चिप्स।
नटखट (1990 का दशक): हल्के और चटपटे गेहूं के कुरकुरे स्नैक्स।
कम कीमत और बेहतरीन स्वाद की वजह से नटखट स्कूल जाने वाले बच्चों की पहली पसंद बन गया। अंकल चिप्स और नटखट दोनों ने मिलकर भारत में चिप्स और पफ्ड स्नैक्स की लोकप्रियता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज यह श्रेणी भारत के पूरे नमकीन स्नैक्स बाजार का 42% से अधिक हिस्सा बन चुकी है।
इन 10 मशहूर स्नैक्स की लोकप्रियता केवल बचपन की यादों की वजह से नहीं है। इनके पीछे मजबूत ब्रांड रणनीति, सही कीमत, हर जगह उपलब्धता और वर्षों तक एक जैसा स्वाद बनाए रखने जैसी कई अहम वजहें हैं। यही कारण है कि ये ब्रांड आज भी भारतीय FMCG बाजार में अपनी मजबूत पहचान बनाए हुए हैं।
इन स्नैक्स को हमेशा ₹1, ₹5 और ₹10 जैसे छोटे पैक में उपलब्ध कराया गया, जिससे हर वर्ग के बच्चे इन्हें आसानी से खरीद सके।
इन ब्रांडों ने देशभर की किराना दुकानों तक मजबूत पहुंच बनाई। आज भी भारत में लगभग 50% FMCG बिक्री पारंपरिक किराना दुकानों के माध्यम से होती है।
इन स्नैक्स का असली स्वाद और खुशबू वर्षों से लगभग वैसी ही बनी हुई है। यही वजह है कि इन्हें खाते ही लोगों को अपना बचपन याद आ जाता है।
आज 10 मिनट डिलीवरी देने वाले क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की वजह से ये पुराने और लोकप्रिय स्नैक्स फिर से नई पीढ़ी तक तेजी से पहुंच रहे हैं। इससे इनकी बिक्री बढ़ रही है और नई पीढ़ी भी इनका स्वाद पसंद कर रही है।
इन सभी कारणों से ये क्लासिक स्नैक्स केवल पुराने समय की यादें नहीं हैं, बल्कि आज भी भारत के FMCG बाजार का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं और आने वाले वर्षों में भी इनकी लोकप्रियता बरकरार रहने की संभावना है।
भारत में आज भी पारंपरिक किराना दुकानें (जनरल ट्रेड) स्नैक्स की बिक्री का सबसे बड़ा माध्यम हैं। देश के कुल स्नैक्स बाजार का 50% से अधिक कारोबार इन्हीं दुकानों के जरिए होता है।
पारले, नेस्ले और पारले एग्रो जैसी कंपनियों ने वर्षों में ऐसा मजबूत वितरण नेटवर्क तैयार किया है, जो देशभर के 60 लाख से 80 लाख (6 से 8 मिलियन) खुदरा बिक्री केंद्रों तक पहुंचता है। इसमें बड़े शहर, छोटे कस्बे, शहरी बस्तियां और दूर-दराज के गांव भी शामिल हैं।
इसी मजबूत नेटवर्क की वजह से मैगी, पारले-जी, फ्रूटी और दूसरे लोकप्रिय स्नैक्स हर समय लोगों की पहुंच में रहे। जब भी किसी को अचानक कुछ खाने का मन हुआ, ये स्नैक्स आसानी से नजदीकी दुकान पर मिल गए।
इन लोकप्रिय ब्रांडों की सफलता का एक बड़ा कारण उनकी कम कीमत वाले छोटे पैक (Low Unit Price - LUP) की रणनीति रही है।
कंपनियों ने 20 ग्राम से 50 ग्राम तक के छोटे पैकेट ₹1, ₹2, ₹5 और ₹10 जैसी किफायती कीमतों पर उपलब्ध कराए। इससे हर वर्ग के लोग, खासकर बच्चे और छात्र, अपनी जेब खर्च में भी इन्हें आसानी से खरीद सके।
आज भारत के स्नैक्स पैकेजिंग बाजार में 68% हिस्सेदारी छोटे पाउच पैक की है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ये पैक सस्ते, आसानी से साथ ले जाने योग्य और एक बार में खाने के लिए सुविधाजनक होते हैं।
वर्ष 2025–2026 में ब्लिंकिट (Blinkit), जेप्टो (Zepto) और इंस्टामार्ट (Instamart) जैसे क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म ने पुराने और लोकप्रिय स्नैक्स को फिर से लोगों के बीच चर्चा में ला दिया है।
आज कई नौकरीपेशा लोग देर रात या ऑफिस में काम करते समय स्नैक्स ऑर्डर करते हैं। ऐसे में वे अक्सर मैगी, फ्रूटी या पारले-जी जैसे स्नैक्स अपने ऑनलाइन ऑर्डर में शामिल कर लेते हैं, क्योंकि ये उन्हें बचपन की मीठी यादों का एहसास कराते हैं।
इस बढ़ते रुझान को देखते हुए FMCG कंपनियां भी 90 के दशक की यादों पर आधारित डिजिटल विज्ञापन अभियान चला रही हैं। साथ ही, 10 मिनट की डिलीवरी जैसी सुविधाओं का लाभ उठाकर इन स्नैक्स को नई पीढ़ी तक तेजी से पहुंचा रही हैं।
खाने-पीने के ट्रेंड समय के साथ बदलते रहते हैं। कभी विदेशी चॉकलेट्स लोकप्रिय होती हैं, तो कभी नए तरह के स्नैक्स बाजार में आते हैं। लेकिन भारतीयों का अपने बचपन के पसंदीदा स्नैक्स से जुड़ाव आज भी उतना ही मजबूत है।
ये 10 मशहूर स्नैक्स सिर्फ भूख मिटाने का साधन नहीं थे। इन्होंने स्कूल के दोस्तों के साथ बिताए खूबसूरत पल, गर्मियों की छुट्टियां, जन्मदिन की खुशियां और परिवार के साथ बिताए यादगार लम्हों को और भी खास बनाया।
आज भी ये ब्रांड समय के साथ नए स्वाद, नई पैकेजिंग और आधुनिक तकनीक को अपनाते हुए अपनी पहचान बनाए हुए हैं। यही कारण है कि बचपन का स्वाद आज भी लोगों के दिलों में वैसा ही ताजा है।
वक्त भले ही बदल जाए, लेकिन मैगी, पारले-जी, मेलोडी, फ्रूटी, जेम्स, पॉपिन्स, क्रैक्स, किस्मी, अंकल चिप्स और नटखट जैसे स्नैक्स हमेशा भारतीय बचपन की सबसे मीठी और यादगार कहानियों का हिस्सा बने रहेंगे।